
हमारा राष्ट्र भारतवर्ष समस्त भूमण्डल में शिक्षा संस्कार में आदिकाल से समस्त संसार को शिक्षित दीक्षित कर अनवरत दिशा बोध देता रहा है। विश्व के समस्त कर्णधारों ने अपने-अपने विवेक से इसकी पुष्टि भी की है।
आदि ऋषि ब्रह्मा से लेकर महर्षि गौतम, कपिल, कणाद, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, भृगु, पाराशर, अपाला, घोषा, अनुसूया, मदाल्सा, मैत्रेयी, गार्गी, सुलभा, महर्षि वेदव्यास, जैमिनी पर्यंत जैसे समग्र क्रांतिदर्शी विद्वान विदुषियों ने अपनी संस्कारशालाओं से दीक्षा लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र, योगीराज श्रीकृष्ण, माता सीता, रुक्मणी जैसी पवित्र आत्माएं आज भी प्रेरणा की स्रोत हैं।
महाभारत काल के उपरांत हमारे संस्कारों में निरंतर आती गिरावट ने हमें आज तक भी ठीक प्रकार उठने नहीं दिया है। इसी कारण योगीराज श्री कृष्ण के बाद महर्षि दयानंद ने संस्कारों में आई गिरावट को देखकर चिंता प्रकट की।
राष्ट्र पिछले पांच हजार वर्षों से ऐसा गिरता चला गया कि भूमण्डल के चक्रवर्ती सम्राट भी संस्कारों के अभाव से ग्रसित होकर त्रिसित हो गये। यहां तक कि पद आक्रांताओं के समक्ष अपने हाथ स्वयं बांध कर बैठ गए। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी वेद विहीन शिक्षा देकर समाज को अंधकार की ओर ले गए।
‘ब्रह्म वाक्य जनार्दनम्‘ की दुहाई देकर कह दिया कि ब्राह्मण के मुख से निकली बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती। जबकि लोगों ने समझा ही नहीं की वेद विहीन ब्राह्मण तो शूद्र से भी निम्न स्तर का होता है।
महाभारत कालोपरान्त महर्षि चाणक्य के बाद महर्षि दयानंद सरस्वती ऐसे क्रांतिदर्शी ने कालजयी ग्रंथ सत्यार्थ-प्रकाश, संस्कार विधि के रूप में ऐसा खजाना (धनकोष ) दिया कि पुनः समाज में संस्कारों की चर्चा होने लगी है। उन्ही 16 संस्कारों में से संस्कार विधि में एक उपनयन संस्कार है जिसे वेदारम्भ या विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। यह संस्कार समस्त 16 संस्कारों में से मुख्य संस्कार है अर्थात् संस्कारों का चक्षु है।

गुरु के आश्रम में शिष्य, गुरु के समक्ष अग्निहोत्र पर यह प्रतिज्ञा करता है।
ओम् मम् व्रते ते हृदयं दधामि मम् चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।
मम वाचकेमना जुषस्व बृहस्पतिष्टवा नियुनक्तु महयम्।।
इस मंत्र में आचार्य प्रतिज्ञा कराते हुए शिष्य को कहता है – हे शिष्य बालक! तेरे हृदय को मैं अपने अधीन करता हूं। तेरा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल बना रहे और तू मेरी वाणी को एकाग्र मन हो प्रीति से सुनकर उसके अर्थ का सेवन किया कर और आज से तेरी प्रतिज्ञा के अनुकूल बृहस्पति परमात्मा तुझको मुझसे युक्त करें। इस मंत्र की भावना के अनुरूप शिष्य भी प्रतिज्ञा करते हुए कहता है कि- हे आचार्य ! आपके हृदय को मैं अपनी उत्तम शिक्षा और विद्या की उन्नति में धारण करता हूं। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित् सदा रहे। आप मेरी वाणी को एकाग्र होकर सुनिए और परमात्मा मेरे लिए आपको सदा मेरे लिए नियुक्त रखें।
इसी प्रकार से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगीराज श्री कृष्ण का भी उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार किया गया। आज भी संपूर्ण आर्यावर्त में संस्कारों से युक्त होकर जन-जन के हृदय में बसे हुए हैं।


ऐसे ही एक उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) में आर्य नेता मूर्धन्य विद्वान सीकर सांसद स्वामी सुमेधानंद सरस्वती जी महाराज ने ग्रेटर नोएडा में गजेन्द्र सिंह आर्य के निज आवास पर उनके पौत्रों अक्षित्, आदित्य का उपनयन संस्कार कराकर अग्निहोत्र पर पौत्रों को संस्कारित कर उपदेश किया और कहा कि समाज में मात्र नामकरण एवं विवाह संस्कार ही होता है और उनका भी रूप आज बिगाड़ दिया है। गजेन्द्रार्य ने अपने पोत्रों का उपनयन संस्कार कर समाज को एक नई दिशा दी है इस प्रकार के आयोजन समाज में होने चाहिए।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री बागपत सांसद श्री डॉ सत्यपाल सिंह ने उपनयन संस्कार को सबसे श्रेष्ठ बताकर उसके महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपनयन संस्कार राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। चारों ओर चहुमुखी विकास हुआ है परंतु मनुष्य के निर्माण में निरंतर गिरावट आई है, जब तक मनुष्य का निर्माण नहीं होगा, चहुमुखी भौतिक विकास से कोई लाभ नहीं होगा। पुरुषार्थ और चरित्र निर्माण की शिक्षा केवल उपनयन संस्कार से ही मिलती है, बालक समझने लगता है कि अब मुझे प्रतिज्ञा बद्ध होकर अपने चरित्र का निर्माण करना है। आज पूर्व प्राचार्य गजेन्द्र सिंह आर्य ने अपने पोत्रों का आर्य विद्वानों के द्वारा उपनयन संस्कार
कराकर समाज और राष्ट्र निर्माण में श्लाघनीय कार्य किया है। आज उपनयन संस्कार को तो लाखों में कोई कोई व्यक्ति करा रहा है जबकि हम सभी को और विशिष्टतया आर्य समाज को इस और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। पोत्रों को अपने हाथ से ‘ओम् यज्ञोपवीतम् ……‘ बोलकर यज्ञोपवीत पहनाकर आशीर्वाद दिया और ओ३म् के प्रतीकात्मक चिह्न (बैज) लगाए।

विशिष्ट वक्ता के रूप में इतिहासकार उगता भारत के मुख्य संपादक ‘भारत को समझो’ के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश आर्य ने कहा कि इस उपनयन संस्कार के कारण ही वीर हकीकत राय जैसे किशोर ने जनेऊ और चोटी की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर दिया “काट दो बोटी बोटी को, ना दूंगा चोटी को“। एक नहीं अनगिनत वीर वीरांगनाओं ने यज्ञोपवीत की रक्षा में सर्वस्व न्योछावर कर प्राणोत्सर्ग किया। ऐसा राष्ट्र के प्रति समर्पण वैदिक संस्कारों के कारण कर पाए ।इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर पूर्व प्रधानाचार्य गजेन्द्र आर्य ने अपने पौत्रों का उपनयन संस्कार कराकर हम सबको इस पवित्र कार्य के लिए प्रेरित किया है ।

इस अवसर पर मूर्धन्य विद्वान गणित ज्योर्तिविद ज्योतिषाचार्य आचार्य दार्शनेय लोकेश ने कहा कि आज का दिन उपनयन संस्कार के लिए अत्तयुत्तम है । शरद सम्पात का मध्य बिंदु है। वेदानुसार ऊर्ज मास ( कार्तिक सौर मास) प्रारंभ हो रहा है, तुला संक्रांति है और सूर्य भगवान भास्कर ठीक शत- प्रतिशत पूर्व में उदयमान है, दिन और रात बराबर है, ज्योतिष के अनुसार शरद् सम्पात का सर्वश्रेष्ठ दिन है। यद्यपि गजेन्द्र आर्य ने अनायास यह दिन चुना है भले ही वे कोई ज्योतिर्विद नहीं हैं।
परंतु जो विचारशील व्यक्ति सत्य की ओर बढ़ता है, सत्य भी उसी की ओर खिंचा चला आता है। उनके पौत्रों को जो आज आशीर्वाद मिल रहा है, यह हजारों गुना बढ़कर इनकी यश कीर्ति में वृद्धि करेगा । जिन विद्वानों के द्वारा उपनयन संस्कार करा गया है वे अति महत्वपूर्ण मूर्धन्य विद्वान हैं। अतः यह परिवार पौत्रों अक्षित् ,अथर्व ,आदित्य के साथ सौभाग्यशाली है । आचार्य दार्शनेय जी ने पंचांगों में आ रही विकृतियों पर प्रकाश डाला । वेद के सिद्धांतानुसार केवल और केवल श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् ही त्यौहार और पर्वों की सही एवं वस्तुनिष्ठ जानकारी देता है।
महर्षि दयानंद जी ने भी वर्तमान में चल रहे पंचांगों में संदेह व्यक्त कर आर्ष पत्रकम् पर ध्यान आकृष्ट किया था लेकिन
समय से पूर्व ही कालकवलित हो गए। उनके बाद उनके अधूरे कार्य को अपनी योग्यता और वेदानुसार श्री दार्शनेय जी इस क्षेत्र में तत्पर हैं और आर्ष पत्रकम् को देकर समाज को जागरुक कर रहे हैं । आज नहीं तो कल अवश्य ही लोग समझेंगे और उपकृत होंगे।

भजनोपदेशिका अलका आर्य ने भी संस्कारों पर प्रकाश डाला और कहा कि दादा गजेन्द्र आर्य ने बच्चों को यज्ञ की विधा और उपनयन संस्कार कराकर हम सबको प्रेरित किया है। हम सभी विद्वानों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।


इस अवसर पर पुत्र और पुत्रवधुओं आर्येन्द्र-गुंजन, राघवेन्द्र-उर्वशी की ओर से, पौत्रों के दादा एवं दादी श्री गजेन्द्र आर्य, राजेन्द्री देवी ने सबको नमन कर आभार एवं धन्यवाद दिया और कहा कि इस दयानंद की पीढ़ी पर आप सब समय-समय पर अपने आशीर्वाद की वर्षा करते रहें।
सादर शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
30 Sept 2023



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