
आर्य समाज ने महर्षि दयानंद सरस्वती के बाद अनेकानेक अनगिनत योद्धा, विद्वान, संन्यासी, आचार्य, शास्त्री, उपदेशक, भजनोपदेशक, पुरोहित, क्रांतिकारी वीर-वीरांगनाएं दिए हैं। यहाँ उनके नाम को लिखना युक्ति संगत नहीं है। जब कांग्रेस के इतिहास के समीक्षक और लेखक स्मृति शेष पट्टाभि सीतारमैया, महात्मा गांधी के प्रश्न के संबंध में उत्तर देते हैं कि राष्ट्र के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले ८५% आर्य समाजी थे, और महर्षि दयानंद के प्रत्यक्ष, परोक्ष, सान्निध्य से प्रभावित होकर सभी तप:पूत आर्य समाज की बलिवेदी पर स्वतंत्रता की हुंकार भर रहे थे, इसी श्रृंखला में आर्य समाज के लौह पुरुष और फील्ड मार्शल तप:पूत संन्यासी स्वामी स्वतंत्रतानंद का शिष्य पण्डित रुचिराम आर्य अरब के सात फेरे लगाने हेतु सात वर्ष के लिए वैदिक धर्म की धर्म पताका फहराने के लिए घर -घर, द्वार -द्वार पर उपदेश कर रहा था।

आर्य समाज का इतिहास और अरब में मेरे सात साल पुस्तक का आद्योपांत पढ़ने से पता लगता है कि अभी हमारे पास बहुत ही अगणित (अनगिनत) गुमनाम महानायक हैं जिनमें एक नाम है पंडित रुचिराम अप्रितम योद्धा।
आपने अरब में प्रचार करते समय कितना कष्ट पाया यह तो अरब में मेरे सात साल पुस्तक से पता चलता है और जिसने सात वर्ष तक बीहड़ जंगलों में, मरुस्थल के थार में, कंदराओं में, घाटियों में और कभी कभी बीस-बीस किमी. पानी के लिए प्यास, तालाब और झरनों से बुझाई हो। जहाँ जंगली हिंसक जानवर रहते हो, वहाँ प्रचार करना वह भी अपने गुरु स्वामी स्वतंत्रतानंद की आज्ञा से, अपने आप में अनूठा अनुपम उदाहरण मिलता है। जैसे श्रीराम पिता की आज्ञा से 14 वर्ष वल्कल काषाय वस्त्रों में चले गये थे, परंतु उनके साथ तो उनका परिवार माता सीता, भ्रातानुज लक्ष्मण साथ थे, यहाँ अकेला अनुपम योद्धा गुरु की आज्ञा से भूमंडल का सबसे दुर्दांत स्थान, अरब में, जहाँ इस्लाम संस्कृति (सर तन से जुदा) दारुल इस्लाम का बोलबाला हो, जैसे केहरी सिंह की माँद में झांकना और फिर रणबांकुरा होने का संदेश देना, यह अलौलिक घटना है।
श्री पण्डित रुचिराम जी का जन्म पश्चिमी पंजाब में बीसवीं सदी प्रथम दशाब्दी में हुआ। महर्षि दयानन्द की जन्म शताब्दी के स्मारक रूप में स्थापित श्रीमद् दयानन्द उपदेशक विद्यालय लाहौर में देश धर्म की सेवा व रक्षा करने के मन में अरमान लेकर प्रवेश पाया। मानव निर्माण कला के अद्भुत शिल्पी स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज उस विद्यालय के संस्थापक आचार्य थे। स्वामी जी ने अपने शिष्य रुचिराम की ईश्वर प्रदत्त गुप्त शक्तियों को पहिचानकर शिष्य का निर्माण अत्यन्त स्नेह व ध्यान से किया। विद्यार्थी के रूप में ही जो कार्य आचार्यजी द्वारा आपको सौंपा गया, आपने उसे अत्यन्त कुशलता से कर दिखाया। उस काल में विद्यालय में देश धर्म की सेवा के लिए समर्पित कई भावनाशील युवकों ने शिक्षा प्राप्त की। सर्वथा नि:स्वार्थ शिक्षा प्राप्त करने वालों में पण्डित रामचंद्र जी (स्वामी सर्वानंन्द जी), पण्डित शांति प्रकाश जी, पण्डित नरेन्द्र जी, पण्डित शिवदत्त जी, मौलवी फ़ाज़िल आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं।
पण्डित रुचिराम के पढ़ाई करते हुए ही, साहसिक कार्यों के करने में अदम्य उत्साह को देखकर आचार्य जी ने प्रशिक्षण भी उसी प्रकार का दिया। रुचिराम जब विद्यालय में पढ़ते थे उन्ही दिनों लाहौर में एक विधवा महिला का उसकी दो पुत्रियों सहित मुसलमानों ने चालाकी से अपहरण कर लिया। इससे लाहौर के हिन्दुओं का मनोबल गिराने का लाभ मुसलमानों ने उठाया। आचार्य स्वामी स्वतंत्रतानंद ने तब चार आने की तुर्की टोपी क्रय कर के रुचिराम को पहिनाकर एक कठिनाई भरा काम सौंप दिया। टोपी को पहिनकर रुचिराम बहुत ही सुघड-सलौना मुस्लिम युवक दिखाई देता था। रुचिराम ने गुरू आज्ञा मानकर कार्य को संपन्न करने की ठान ली।
स्वामी जी का आदेश पाकर रुचिराम अपने कार्य को संपन्न करने हितार्थ चल पड़ा। ईशकृपा से उन दोनों युवतियों और उनकी माँ को मस्जिद में खोज लिया। इस तुर्की टोपीधारी युवा मौलाना (पण्डित रुचिराम)को वहाँ बैठे मुसलमानों ने तबलीग़ (प्रचार/ दावा تبلیغ ) के लिए इसके उत्साह को देखकर कहा – तुम भी विधवा (बेबा) स्त्री और इसकी पुत्रियों के लिए कुछ सहायता सहयोग करो। पंडित रुचिराम ने कहा आप यदि इन्हें मेरे साथ भेजें तो मैं कई उदार हृदय मोमिनों से अच्छी सहायता दिलवा सकता हूँ । मुसलमानों ने उन तीनों को इस युवा मौलवी अर्थात् रुचिराम को सौंप दिया। यह उन्हें घुमाता हुआ बाज़ार से निकल रहा था तो इसे सामने से ख़ुशहालचंद जी और भाई परमानन्द जी आते दिखाई दिए। वे कुछ पूछते हैं उससे पहले रुचिराम ने कहा – यह विधवा महिला संकट में है, इसकी ये दो बेटियां है। आप इन्हें कुछ दान पुण्य करें। वे दोनों समझ गए कि ये वही अपहृत देवी है, विचार कर दोनों ने कहा हम अवश्य इनकी सहायता करेंगे। रूचिराम उन्हें लेकर स्वामी स्वतंत्रतानंद के पास गए। आपकी इस उपलब्धि से हिन्दुओं का मनोबल बढ़ा, और आपकी विशिष्ट पहचान बन गई। आर्य समाज का यश भी बढ़ा और आपके इस अदम्य साहस की कीर्ति फैल गई।
इसके पश्चात स्वामी स्वतंत्रतानंद जी ने आपको अरब भेज दिया, इससे आपको बहुत कीर्ति मिली क्योंकि अरब में प्रचार करना एक दुष्कर कार्य था। वह भी सात वर्ष। उसके उपरांत शुद्धि आंदोलन में भी आपने पुनः जान जोखिम में डालकर जाति रक्षा के लिए गौरवमयी कार्य किए।

आप स्वामी श्रृद्धानंद के विरुद्ध खाजा हसन निज़ामी की धमकियाों तथा षडयंत्रों का पल-पल का पता, वहीं उनके डेरे से निकालकर छद्म नाम से दैनिक “तेज” में लेख लिखते रहे। वे लेख इन पंक्तियों के प्रोफ़ेसर राजेन्द्र जिज्ञासु अबोहर ने “तेज” की पुरानी फाइलों से लेकर रूचिराम की खोजी पत्रिका “तेज” से प्राप्त किया है। फिर भी स्वामी जी (श्रृद्धानंद) का बलिदान हो गया। हत्यारे को फाँसी से बचाने के लिए मुसलमानों ने अनेकानेक षड्यंत्र रचे। साथ ही तत्कालीन देश के महानायक महात्मा गांधी भी पीछे नहीं थे उन्होंने भी घातक अब्दुल रशीद हत्यारे को फाँसी से बचाने की बचकाना हरकत (पहल) कर अपने “यंग इंडिया” में लिखा कि स्वामी श्रृद्धानंद की गलती है उन्हें घर वापसी का शुद्धि आंदोलन नहीं चलाना चाहिए था। अब्दुल रशीद का कोई भी दोष नहीं है, वह मेरा भाई है मैं उसका मुक़दमा लड़ूँगा।

जहाँ राष्ट्रीय भक्तों का कत्लेआम होता हो वहाँ भी हम भाई-चारा की बात करें, संभवतः हम इसी कारण पहलगाम तक की यात्रा कर चुके हैं। हमारे ऐसे राष्ट्रनायकों ने आज तक कोई पहल न करके पहलगाम में माँ बहिनों का सिंदूर सुहाग को उजड़ने में सहयोग कर भारत की गौरवमयी संस्कृति को उजाड़ दिया है। आज भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री ने बहिनों के सुहाग सिंदूर की रक्षा हितार्थ सिंदूर ऑपरेशन कर कुछ-कुछ संतोष मिला है परन्तु अभी बहुत कुछ बाक़ी है, अवसर है कि हम अपनी बहादुर सेना की शक्ति शौर्य का लाभ लेते हुए आर पार का खेला होने दें। दुर्भाग्य है राष्ट्र का कि सेना मैदान में युद्ध जीत जाती है और नेता दबाव में आकर नोबल पुरस्कारों की होड़ में टेबल पर युद्ध हार जाते हैं। १९६५, १९७१ चाहे १९९९ का कारगिल युद्ध हो, गाँव की कहावत है, छ: दिन चले अढ़ाई कोस। बार-बार यह कहना कि घर में घुसकर मारेंगे कहना समीचीन नहीं लगता। अब तो उन घरों को अपने अधिकार में लो जहाँ सांप सपोले पैदा कर रहे हैं अर्थात अधिकृत कश्मीर, अपने भारत में विलीन होना चाहिए, नहीं तो मियां जी की जूती और मियाँ जी की चाँद वाली कहावत चरितार्थ होती रहेगी । हमारा ही पाक अधिकृत कश्मीर हमारे लिए सदैव हमारी भारत के सिंदूर को चोटिल करता रहेगा।
पण्डित रुचिराम जी, भाई श्यामलाल के महाबलिदान के समय आपने नया इतिहास रचकर आर्य समाज की शान में चार चाँद लगा दिए। सरकार ने भाई जी को विष देकर कारागार में मारा। आपने कारागार से शव लाकर और सरकारी गाड़ी में लेकर शोलापुर की ओर चल दिए। शव को शोलापुर पहुँचाने में पण्डित रुचिराम जी की महती भूमिका थी। आप अधिवक्ताओं से तेज-तर्रार अपनी वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे।

भारत सरकार की सेवा में विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने का प्रयत्न किया तब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सरकार को एक कुशल गुप्तचर पण्डित रुचिराम की जानकारी दी। यह हमारी सेनाओं की बहुत बड़ी सहायता कर सकता है और सहायता की। जहाँ हमारे सरकारी अधिकारी असफल हो जाते हैं वहाँ रुचिराम सफल होकर सरकार और सेनाओं को सूचना देते। कश्मीर की सेवाओं को आपने आगे बढ़ाया। यदि रुचिराम गुप्तचर का कार्य निष्ठा से नहीं करते तो भारत का मुकुट कश्मीर हमारे हाथ से निकल गया होता। हैदराबाद को भारत का अंग बनाने में रुचिराम ने गुप्तचर के रूप में सराहनीय सेवाएँ दी। नेहरू जी के काल में भी एक अच्छा गुप्तचर के रूप में पण्डित रुचिराम ने पाकिस्तान में रहकर पग-पग पर भारत सरकार की सहायता की और सेनाओं के सहयोगी बने रहे, पर आज पण्डित रुचिराम का कौन मूल्यांकन करता है और कर रहा है। सन् १९६५ के युद्ध में एक गुप्तचर के रूप में रुचिराम पाकिस्तान में थे उस समय हमारी सेनाओं की विजय का मुख्य कारण पण्डित रुचिराम थे। सन् १९७१ में भारत सरकार ने पुन: गुप्तचर के रूप में पण्डित रुचिराम की सेवाएँ लीं और जीवन की संध्या में भी आपका उत्साह प्रशंसनीय रहा है। अब आपकी नेत्र ज्योति कम हो चुकी थी और आप सेवा मुक्त होना चाहते थे। सेना उन्हें छोड़ती नहीं थी। बात प्रधानमंत्री तक पहुँची तो आपको सेवा छोड़ने में कठिन परिश्रम करना पड़ा। सन् १९६५ के युद्ध के बाद पाकिस्तान इन्हें सेना ने भारत में प्रविष्ट करा दिया और उनके धाम दीना नगर पहुँचा दिया।
शीश तली पर धरकर वर्षों तक देश धर्म की रक्षा करते हुए इस महर्षि दयानन्द भक्त बलिदानी को न तो सरकार ही सम्मान दे पाई और न ही आर्य समाज व अन्य हिन्दू संगठन।
आज आर्य समाज के कार्यालयों में भी पण्डित रुचिराम का चित्र और चरित्र नहीं मिलता। हम जानते हैं कि अंधेरा जितना अधिक होगा, उजाले का महत्व भी उतना ही अधिक होगा। आर्यों (हिंदुओं) सावचेत हो जाओ पण्डित रुचिराम ने जो राष्ट्र के लिए किया, ऐसे राष्ट्रभक्त बनकर राष्ट्र को बचाओ।
हम अपने ज्ञान और कर्म से ऊँचा उठें। वर्तमान में इसकी महती आवश्यकता है लेकिन हम मंदिर की मूर्तियों को ऊँचा उठाने में लगे हुए हैं। जिस दिन हम अपने चरित्र बल से ऊपर उठ जाएँगे, उस दिन मंदिर की मूर्तियाँ अपने आप उठ जाएंगीं।
उठे हुओं को उठाने की आवश्यकता नहीं है, सोए हुए और खोए हुओं को उठाने की आवश्यकता है, तभी जीवन सार्थक है नहीं तो निरर्थक है।
रुचिराम से संकट मोचक,
बनें वीरव्रत सेनानी ।
आज्ञाकारी बने सत् गुरू के,
करें न अपनी मनमानी ।
श्वांस प्रश्वांस समर्पित हो,
राष्ट्र को जीवन अर्पित हो ।
ध्यातव्य:
विशेष कार्य : आर्य समाज (हिजबुल्लाह) की स्थापना और प्रचार-प्रसार कार्य
- पासनी बंदरगाह में पहला आर्य समाज और वैदिक पुस्तकालय की स्थापना।
- खाड़ी फारिस, ग्वादर में दूसरा आर्य समाज और वैदिक पुस्तकालय की स्थापना।
- मस्कट में तीसरा आर्य समाज स्थापित किया, जिसका अरबी नाम “हिजबुल्लाह” रखा गया।
- हिजबुल्लाह का अर्थ है “एक ईश्वर को मानने वाली पार्टी”।
- अच्छे कार्य करने वालों को “हिजबुल्लाह” तथा बुरे कार्य करने वालों को “हिजबुश शैतान” कहा जाता है।
- खलीज फारिस नदी के निकट हिजबुल्लाह की स्थापना।
- दुबई में हिजबुल्लाह की स्थापना।
- कतर और बहरीन में हिजबुल्लाह का प्रचार किया।
- इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित स्थानों पर आर्य समाज (हिजबुल्लाह) की स्थापना की गई:
- बहरीन, अल-हसा, रियाज़, मक्का, एहराम, बैतुल्लाह, जाबल, मदीना, यंबू, अमलुज़, अल-वाज, दुबा, खरेबा, मिस्र (अफ्रीका), काहिरा (मिस्र), इस्कंदरिया, पोर्ट सईद, फिलिस्तीन, बैतुल मुकद्दस, याफा, तेल-अवीव, शाम, तुर्की, बेरूत, ज़बाल, लेबनान, दमिश्क, ज़बाल दरूज़, हलब, अल-इराक, करबला, बसरा, कुवैत, मस्कट, मोकल्ला (यमन), तैज़, लाहेज, हुडेदा, सना, अदन, ज़ुफार, मासिरा आदि।

आर्य समाज (हिजबुल्लाह) को शाही समर्थन
आर्य समाज (हिजबुल्लाह) को विभिन्न शासकों का सहयोग प्राप्त हुआ, जिन्होंने इसके प्रचार-प्रसार में न केवल आर्थिक सहायता दी बल्कि अपने क्षेत्रों में इसके सिद्धांतों को भी अपनाया।
समर्थन देने वाले प्रमुख शासक:
- दुबई – शेख सईद
- कतर – शेख अब्दुल्ला बिन कासिम
- बहरीन – शेख ईशा
- मक्का-मदीना – मलिक अब्दुल अज़ीज़ इब्न सऊद
- तुर्की – शेख अबू बकर
- अलहसा – शेख अब्दुल्ला बिन जलावी
शाही सहयोग के रूप:
- आर्थिक सहायता – आर्य समाज (हिजबुल्लाह) के विस्तार के लिए वित्तीय सहयोग दिया गया।
- विधायी स्वीकार्यता – कुछ शासकों ने अपने क्षेत्रों में इसके आदर्शों को लागू किया।
- सामाजिक एवं धार्मिक सुधार – नैतिकता, सत्य, और समानता को बढ़ावा देने के प्रयास हुए।
- वैचारिक विस्तार – आर्य समाज की शिक्षाओं को विभिन्न देशों और क्षेत्रों में फैलाया गया।
इस शाही समर्थन ने आर्य समाज (हिजबुल्लाह) को व्यापक रूप से स्थापित करने और उसके मूल सिद्धांतों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज “हिजबुल्लाह” शब्द को एक शिया इस्लामिक राजनीतिक दल और मिलिटेंट समूह के रूप में जाना जाता है, जिसका मुख्यालय लेबनान में स्थित है। इस नाम का वर्तमान उपयोग एक अलग राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ में होता है।



शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
15 May 2025



Leave a comment