
वेद अपौरुषेय हैं और ईश्वर कृत हैं। सर्वप्रथम परमपिता परमात्मा की महती कृपा से अमैथुनी सृष्टि के परम ब्रह्मर्षि अग्नि, वायु, आदित्य, अङिगरा के हृदय में वेदों का प्रकाश किया। सृष्टि के प्रथम ऋषियों में ब्रह्मा आदि अनेक ऋषि-ऋषिकाओं के पुण्य प्रतापी आत्माओं के हृदय को प्रकाशित कर आलोकित किया।
यही वैदिक स्वस्थ परम्परा एक अरब सत्तानवें करोड़ उनतीस लाख उनपचास हज़ार एक सौ छब्बीस वर्ष से अनवरत, अविरल ज्ञानगंगा वैदिक धर्म से सनातन प्रवाहित हो रही हैं। इसी सनातन परम्परा को हमारे ऋषि, महर्षि और दिव्य महान पुरुष सम्पूर्ण भूमण्डल पर प्रचारित और प्रसारित करते रहे हैं।
वैदिक सिद्धान्त के अनुसार हमारे कुछ पर्व विशिष्टता रखकर, पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर दृष्टिगोचर होते हैं। जिनमें मधु (चैत्र) शुक्ल प्रतिपदा संवत् पर्व, नभस (श्रावण) पूर्णिमा श्रावणी पर्व, ईष (आश्विन) शुक्ल विजयदशमी विजय पर्व और शारदीय नवसस्येष्टि पर्व दीपोत्सव प्रकाश पर्व (ऊर्ज) कार्तिक मास अमावस्या में, साथ ही वासन्ति नवसस्येष्टि पर्व होलिकोत्सव तपस्य ( फाल्गुन पूर्णिमा) हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। साथ ही माघ मकर संक्रांति पर्व सूर्य का पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ओर अग्रसर होने का नाम, वेद शास्त्र और सूर्य सिद्धान्त के अनुसार खगोलीय वैश्विक घटना के कारण उत्तरायण पर्व मकर संक्रांति पर्व के रूप में जाना जाता है।
जैसे सूर्य २१ दिसंबर २०२४ को ठीक दिन के दो बजकर चौवन मिनट पर सूर्य पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ओर उन्मुख हुआ अर्थात् पृथ्वी की अपनी गति अनुसार पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर बढ़ा। इसी में भारत की भूमि पर माघ (मकर) संक्रांति का प्रथम सूर्योदयन २२ दिसम्बर २०२४ में हुआ। इसी दिन अनेक वैदिक सिद्धान्त के पुजारियों ने उत्तरायण पर्व का स्वागत मकर संक्रांति के रूप में मनाया।
भारत में मोदी सरकार की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वत नैनी हरीश ने कहा कि २१ दिसंबर २०२४ का दिन ध्यान दिवस अर्थात् २१ दिसंबर शीतकालीन अयनांत या संक्रांति का दिन है।
भारतीय परम्परा के अनुसार इस दिन उत्तरायण शुरू होता है विशेष रूप से आंतरिक चिंतन और ध्यान के लिए वर्ष के एक शुभ समय की शुरुआत इसी दिन से शुरू होती है।
विश्व ध्यान दिवस पर प्रस्ताव को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका विश्व के नेतृत्व के प्रति उसकी (भारत) प्रतिबद्धता का प्रमाण है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक सौ तिरानवें देशों ने इसका पुरज़ोर समर्थन किया। इस प्रस्ताव का समर्थन समस्त राष्ट्रों के साथ बुल्गारिया, बुरुंडी, डोमिनिकन गणराज्य, आइसलैंड, लक्जमवर्ग, मॉरीशस, बांग्लादेश, मोनाको, मंगोलिया, मोरक्को, पुर्तगाल और स्लोवेनिया आदि अनेक देशों ने ध्यान दिवस को उत्तरायण संक्रांति के रूप में मनाया।
भारत सरकार ने भी ध्यान दिवस को उत्तरायण (प्रकाश पर्व) संक्रांति के रूप में मनाया। भारत सरकार ने अभी लोकाचार विचार को ध्यान में रखकर स्पष्ट रूप से मकर संक्रांति पर्व भले ही न कहा हो क्योंकि सरकारें समाज और लोकाचार को ध्यान में रखकर काम करती है, कहीं उनका वोट बैंक न खिसक जाए। यही कारण है कि १४ जनवरी २०२४ को प्रथम अमृत महोत्सव का स्नान महाकुम्भ पर प्रारंभ हुआ। यद्यपि दूरस्थ स्थानों से आने वाले भक्तगण तो २१ दिसंबर २०२४ से इस आस्था की डुबकी में अनवरत स्नान करते जा रहे हैं।
कुम्भ हमारा शास्त्रोक्त वैदिक पर्व नहीं है अपितु यह हज़ारों वर्षों से चली आ रही एक स्वस्थ वैदिक सत्य सनातन परम्परा है।
समुद्र मंथन की बात कहकर बार बार दोहरान् करने से यह पर्व अवैज्ञानिकता को जन्म देता है। समुद्र मंथन आदिकाल से आवश्यकता और विकास के आधार पर सदा-सदा से होता रहा है, और आज भी सभी राष्ट्र अपने-अपने सीमांकन से समुद्र मंथन और दोहन कर अपने राष्ट्र का विकास कर रहे हैं। सीता की खोज में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र ने भी वानर, निषाद, किरात आदि अनेकानेक प्रबुद्ध विद्वानों, बुद्धिमानों, वैज्ञानिकों एवं विश्वकर्माओं के माध्यम से रामेश्वरम् स्थान (पहले यह नाम नहीं था ) पर एक यज्ञ के माध्यम से अनुष्ठान कर सभी के विचारों से अभिभूत होकर सुग्रीव की सेना के विश्वकर्मा (अभियन्ता), नल-नील के माध्यम से एक राम सेतु का वैज्ञानिक विधि से समुद्र मंथन कर सेतु का निर्माण किया गया और लंका पर चढ़ाई कर माता सीता को मुक्त कराया। यही समुद्र मंथन है पौराणिक आस्थाओ से जिस प्रकार माननीय शंकराचार्यों और धर्माचार्यों तथा जगद्गुरुओं के द्वारा आज समाज को दिग्भ्रमित किया जाता रहा है वह समीचीन नहीं हैं। हमें यह बताना चाहिए कि १४ रत्न जो निकले, वो १४ प्रकार की विद्यायें थी। विद्या सब विधाओं की जननी है। विद्या से बड़ा कोई रत्न नहीं हैं। महाप्रलय के उपरांत सृष्टि के उद्भव के समय समुद्र का जल त्रिविष्टम (तिब्बत) से हटा तो परमपिता परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अङिगरा के माध्यम से ब्रह्मादि अनेक ऋषियों को १४ विद्याओं के साथ वेद के रूप में वह सब कुछ दिया कि उससे समय-समय पर अब भी समुद्र मंथन हो रहे हैं।

आज जिस महाकुम्भ का मेला चल रहा है, यह भी एक वैदिक सत्य सनातन परम्परा का ही चक्र हैं। किसी समय वैदिक काल से हमारे यहाँ ऋषि, महर्षि, मुनि और महान पुरुष जंगलों और वनों, पहाड़ों पर बैठकर जो तप साधना करते थे और स्वाध्याय से अपने सभी मनोविकारों को दूर करके अपने यजमानों (गृहस्थाश्रम) को गाँव-गाँव और नगर-नगर में जाकर अपने उपदेशों से अभिसिंचित कर, उन्हें एक वर्ष के लिए आप्लावित कर, आनंद की अनुभूति कर, राष्ट्र के निर्माण में एक महती भूमिका निभाते थे। ठीक उसी शृंखला में क्रम त्रिवर्षीय, षडवर्षीय व द्वादशवर्षीय की एक सामूहिक प्रवचनों, उपदेशों की परम्परा स्थापित हो गई। बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि, मुनि, वानप्रस्थी, शंकराचार्य, धर्माचार्य, जगद्गुरु, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर प्राकृत संसाधनों को ध्यान में रखकर विचारों का सागर मंथन कर समूचे आर्यावर्त्त को चार भागों, दिशाओं में रखकर हरद्वार, प्रयागराज, उज्जैन तथा नासिक स्थानों का वैचारिक क्रांति हितार्थ चयन किया गया। हरद्वार (भागीरथ गंगा), प्रयागराज त्रिवेणी (गंगा यमुना सरस्वती), उज्जैन (शिप्रानदी) और नासिक (गोदावरी नदी) पर स्थित है। इन्हीं स्थानों पर विद्वानों के सारगर्भित उपदेशों से सत्य सनातन वैदिक धर्म की अविरल पवित्र ज्ञान गंगा समूची वैदिक संस्कृति को समाहित करने और विश्वपटल पर विश्ववारा संस्कृति को आच्छादित हितार्थ करती रही है, वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष करती रही है अर्थात् सारा विश्व एक परिवार है।
कृण्वन्तो विश्वमार्यम का निनाद करते हुए संदेश देती थी कि सारे विश्व के लोगों, सर्वश्रेष्ठ बन जाओ।
सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का यही अंतिम मूलमंत्र है।
हम हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, सिक्ख, बौद्ध, जैन, चार्वाक, यहूदी या वाममार्गी आदि न बनें अपितु मनुर्भवः, मनुष्य बनें और अपनी संतति को दिव्य गुणों से अमृत प्रदान करें। अतः आज जो महाकुम्भ चल रहा है यदि यह ध्यान दिवस उत्तरायण पर्व से प्रारंभ होता तो ज्योतिष जो वेद का परम चक्षु है, गणित ज्योतिष के अनुसार और लोकाचार के १२ फ़रवरी को पूर्णिमा को अंतिम हो जाता है, फिर भी कुम्भ का मुख्य ध्येय धर्म संस्कृति और संस्कारों से जनमानस को जागृत करना चाहिए, केवल गंगा के संगम, प्रयागराज तीर्थ पर स्नान करने से मोक्ष मिल जायेगा एवं सारे पाप धुल जाएंगे और पुण्य प्राप्त होगा ऐसा कदापि नहीं होगा। १४४ वर्षों का संयोग बताकर वैदिक सिद्धान्त का अवमूल्यन किया जा रहा है। ज्ञानी जन बताते हैं फलोपभोग के बिना कर्म का क्षय नहीं होता।
न भुक्तं क्षीयते कर्मकल्प कोटि शतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
बिना भोग के कर्मों का क्षय नहीं होता करोड़ों वर्ष बीत जाने पर भी बिना भोगे कर्म नष्ट नहीं होते। मनुष्य को शुभ और अशुभ कर्म अवश्य भोगने पड़ते हैं।
यथाकारी यथाचारी तथा भवति, साधुकारी साधुर्भवति।
पापकारी पापो भवति, पुण्यः पुण्येन कर्मणा भक्ति पापः पापेन॥
मनुष्य का जैसा कर्म होता है वैसा ही उसका आचरण होता है। वैसा ही बन जाता है, भला करने वाला भला बन जाता है । पुण्य कर्म से पवित्र और पाप कर्म से पापी बन जाता है।
Man is where his mind is, Mind determines what man is.
जैसा सोचोगे वैसा हो जाओगे, इसलिए वैसा सोचो जैसा होना है

केंद्र सरकार के सानिध्य से राज्य सरकार की व्यवस्थाएं अत्युत्तम हैं जिससे किसी भी पर्यटक भक्त की आस्था के साथ कोई खिलवाड़ न करें। देश, विदेशों के राजनैयिक और गणमान्य महानुभाव भी इस सनातन परम्परा का आनंद सानन्द उठाते देखे गए। कुछेक अप्रिय घटनाएं जो बड़ी मर्मांतक और हृदय विदारक घटी है उनका तो महाकुम्भ ने संसार ही उजाड़ दिया परंतु इसमें कुम्भ का दोष नहीं है । कुछ सिरफिरे, असामाजिक तत्वों की साज़िश ने तुच्छ राजनीति के कारण बहुतों के घर में अँधेरा कर दिया। लेखक उनकी दिवंगतात्मा हितार्थ शांति की कामना करता है ।
कुम्भ के ही एक धर्माचार्य, धर्मगुरू कालीचरण जी संत यह उपदेश करते देखे गए की जो दिवंगत आत्मा प्रयागराज तीर्थ में मृत्यु को प्राप्त हो गई हैं उन सभी को मोक्ष मिलेगा। एसा दर्दनाक कथन उन परिवारों के प्रति जले पर नमक और नीबू डालना है। ऐसे धर्मगुरूओं को अपने अखाड़ों से निकाल देना चाहिए।
सारांश यह है कि समस्त माननीय शंकराचार्यों, धर्माचार्यों, महामंडलेश्वरों, जगद्गुरुओं को इस शुभ वेला पर कुछ निर्णय कठोरता के साथ लेने चाहिए, जैसे किसी भी समाज का वेदों का विद्वान सदाचारी व्यक्ति (स्त्री पुरुष) भी शंकराचार्य, धर्माचार्य, महामंडलेश्वर बन सकता है। सबको यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार दिया जाए। प्रत्येक गुरुकुल में आर्य समाज का गुरुकुल हो या पौराणिक सनातनी, सभी को समान रूप से पाण्डित्य पाने का अधिकार होना चाहिए। हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर सभी धर्माचार्य, जगतगुरु ध्यान आकृष्ट करें, साथ ही धर्मांतरण की गतिविधियों पर कोई योजना, माननीय शंकराचार्यों धर्माचार्यों द्वारा बनायी जाए। कमज़ोर, आकिंचन और दलित वर्ग को सुविधा का प्रलोभन देकर उन्हें इस्लाम और ईसाई मिशनरी उनका धर्मांतरण कर रही हैं। आप समाज के क्षत्रप हैं, समाज आपकी ओर देख रहा है। वेटिकन सिटी में बैठा हुआ पोप और अरब (मक्का मदीना) में बैठा ख़लीफ़ा हज़ारों हज़ार मीलों पर बैठे भारत माता का धर्मांतरण कर चीर हरण कर रहे हैं और हमारे सभी धर्माचार्य, शंकराचार्य महाभारत के भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि की तरह मूकदर्शक बने रहे तो वह दिन दूर नहीं, आप भी इस्लाम और ईसाई की गोद में समा जाएंगे। अब तो हमें कृण्वन्तो विश्वमार्यम के घोष को सार्थक करना पड़ेगा।
जिस तरह महर्षि दयानंद ने अपने कालजयी ग्रन्थ में ईसाई, इस्लाम के साथ न्याय कर सत्यासत्य पर पराधीन भारत में दो टूक जो लिखा है, कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश ने जो हिन्दू समाज की धमनियों में रक्त संचारित किया है, उसी से राष्ट्र और समाज जीवंत है। अतः आओ सोचें और विचारें समस्त माननीय आप (शंकराचार्य, धर्माचार्य इत्यादि) हिंदू समाज की नाभि हैं।
विद्या सब धन की नायक है,
विद्या के सब धन पायक हैं।
श्वासों का उद्देश्य कर्म है थक कर क्यों मर जाएँ ।
मरने से पहले कुछ कर लें, याद सभी को आएं॥
शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य
धर्माचार्य जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर
बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)
05 Feb 2025



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