सृष्टि के प्रादुर्भाव उपरांत अमैथुनी सृष्टि के प्रथम ऋषियों के हृदय को सर्वोत्तम मानकर परमपिता परमात्मा ने आदि ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा को वेद ज्ञान बीज रूप में दिया। इन पवित्रात्माओं ने प्रथम मानव ऋषि और ऋषिकाओं को वैदिक ज्ञान देकर समस्त सृष्टि को इस ज्ञान-विज्ञान से आलोकित किया। इसी शृंखला में ब्रह्मादि अनेक ऋषि और ऋषिकाओं ने अनवरत श्रुति के माध्यम से ही मानव जगत को प्रकाशित कर ऋषि परंपरा को जीवंत रखा।

मनुष्य अल्पज्ञ है और ईश्वर सर्वज्ञ है, अतः धीरे-धीरे अपनी कुसंगत से उसकी अल्पज्ञता में और न्यूनता मानक बढ़ने लगा, तो कतिपय विद्वान ऋषियों ने श्रुति को, अर्थात वेदों को, लेखनीबद्ध कर इस सत्य सनातन वैदिक ज्ञान को सुरक्षित कर दिया। आज एक अरब सत्तानवे करोड़ उनतीस लाख उनचास हजार एक सौ सत्ताईस वर्षोंपरान्त भी वेद ज्ञान सुरक्षित है।
इस वेद ज्ञान की सुरक्षा में ब्रह्मवेत्ता ऋषियों का, समस्त भूमंडल के चक्रवर्ती सम्राटों का, ब्रह्मवेत्ता विद्वानों का, अध्यापकों का, उपदेशकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जब-जब वेदों को समझने में कठिनाई आने लगी, तब-तब विद्वान ब्रह्मवेत्ता ऋषियों ने वेदांग, उपांग, उपनिषदों के माध्यम से ऋषि परंपरा को और सुदृढ़ किया।
महाभारत काल तक यह परंपरा अविच्छिन्न विधि से चलती रही। हाँ, जब-जब वेद के प्रतिकूल आचरण रहा, तब-तब हम अशांति के दौर से विचलित हुए। यहाँ तक कि वेद विरुद्ध होने से अनेकानेक युद्धों से भी गुज़रना पड़ा। राम-रावण युद्ध और महाभारत जैसा विश्व युद्ध ने भी हमें झकझोर दिया।

अनगिनत विद्वान, वैज्ञानिक, शिल्पकार, महान योद्धा, युवा, किशोर सब काल के गाल में समा गए। अठारह दिन के युद्ध में अठारह अक्षौहिणी ( लगभग ४५,००,०००) सेना स्वाहा हो गई और इससे अधिक लोग किसान, श्रमिक, शिल्पकार भी मारे गए। विधवाओं की चीत्कार, छोटे दुधमुंहे बच्चों का करुण क्रंदन ने धरती को हिला दिया।
महर्षि दयानंद सरस्वती तो सत्यार्थ प्रकाश में उल्लेख करते हैं कि महाभारत युद्ध से एक हज़ार वर्ष पूर्व से ही वेदों के प्रतिकूल आचरण के कारण संस्कृत, संस्कृति, संस्कार की गिरावट ही युद्ध की परिणति बन गई।
इतने पर भी महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में समस्त भूमंडल के शासकों ने आकर यहाँ की अधीनता स्वीकार कर अपना सौभाग्य माना था। चाहे चीन का राजा भगदत्त, अमेरिका का शासक बब्रुवाहन, यूरोप का विडालाक्ष (संदर्भ : सत्यार्थ प्रकाश ) आदि—विश्व के नेताओं व शासकों ने सप्रेम स्वर्ण मुद्राएँ और अनेक उपहार देकर महाराज युधिष्ठिर को अपना नेता मानकर सम्मान दिया था, लेकिन धीरे-धीरे अविद्या के कारण कई प्रकार के मत-पंथों का जन्म हुआ और मनुष्य नास्तिकता की ओर अग्रसर हुआ।
पुरुषों की संख्या कम और स्त्रियों की संख्या अधिक होने से आर्य संस्कृति का ह्रास हुआ और वर्णसंकर मनुष्य अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलापने लगे।
महर्षि दयानंद कालजयी ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में आद्य शंकराचार्य का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि आज से २२०० वर्ष पहले दक्षिण देशस्थ नम्बूदरीपाद ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर शंकर ने भटकते आर्यों (हिंदुओं, उस समय ‘हिंदू’ नाम नहीं था) को जैन और बौद्ध बनने से रोका, परंतु आद्य शंकराचार्य को भी मात्र तैंतीस वर्ष की अवस्था में जैनमत के लोगों ने विषपान कराकर इहलीला समाप्त कर दी।
उनके उपरांत अनेकानेक साधु-संत धर्मात्माओं ने भक्ति आंदोलन का सहारा लेकर अपने-अपने कालखंड में ईश्वर, धर्म, संस्कृति के रक्षक बनकर कुछ काम तो किया, परंतु समाज को धर्मभीरु बना दिया।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर अपनी स्वरचित पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखते हैं कि अपने काल में अनेक संत—चाहे गुरु नानक, दादू, तुलसी, निम्बाचार्य, सूरदास, कबीर, राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, आत्माराम पांडुरंग, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि—अनेक महापुरुषों ने अपनी योग्यतानुसार शक्ति-सामर्थ्य से कार्य किया है, लेकिन महर्षि दयानंद सरस्वती की शैली बहुत आक्रामक और रक्षात्मक थी। सत्य-असत्य पर डंके की चोट बोलना उनके जीवन का अभिन्न अंग था। चाहे कोई हमें तोप के मुँह से बाँधकर गोले से भून दे अथवा हमारी अंगुलियों को मोमबत्ती की भाँति जलाकर राख कर दे, लेकिन हम सत्य से विचलित नहीं होंगे। वेद, महर्षि के लिए प्रथम और अंतिम अस्त्र और शस्त्र थे।
इसी कारण लोग कहते हैं कि सभी महापुरुषों ने हमें डूबने से बचाया, पर दयानंद ने हमें तैरना सिखाया।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर एक और बहुत महत्वपूर्ण बात लिखते हैं:
जिस राष्ट्र में एक ही धर्म, संस्कृति, संप्रदाय, जाति के लोग अपने मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को विद्वान घोषित कर देते हों, और वही तथाकथित लोग दूसरे धर्म, संस्कृति, संप्रदाय, जाति के विद्वान से विद्वान व्यक्ति को मूर्ख घोषित कर देते हों, तो उस देश की संस्कृति, संस्कृत, संस्कार, स्वतंत्रता, समृद्धि के बारे में यही कहा जा सकता है—
‘रहिबे को अचरज है, गई तो अचरज कौन!
अर्थात्—
यदि स्वतंत्रता, समृद्धि, संस्कृति, संस्कृत चली गई, तो कोई बात नहीं; बल्कि जो रह गई है, वह ही अचरज है। ऐसे निम्न कर्म रहे, तो फिर पराधीन हो जाओगे।
आज इटावा में जो कुछ हुआ है, हो रहा है, और आगे और भी होगा और होता रहेगा क्योंकि एक तथाकथित वर्ग ने समाज में ऐसी भ्रांति फैला रखी है कि धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकांड कराने का अधिकार केवल ब्राह्मण को है, अन्य को नहीं।

आज बाबा बागेश्वर धीरेंद्र शास्त्री जैसा अवैदिक व्यक्ति भी इस पुजापे में सबसे अग्रणी है। इसी कारण आज कथाओं का बाज़ार गर्म है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बड़े-बड़े कथाकार पाँच लाख करोड़ का व्यापार कर रहे हैं तथा यह व्यापार बन गया है।
इस देश के प्रधानमंत्री उनके कार्यक्रमों में उपस्थिति देकर MNO₂ की तरह क्रियाशील बनकर परोक्ष रूप से कथा के व्यापार बढ़ाने में वह भी किसी से पीछे नहीं हैं, क्योंकि सबकी दृष्टि दोष २०२७ का चुनाव और वोट ही है।
देश में अब वेद कथा कहीं नहीं होती, क्योंकि वेद कथा तो स्वाध्याय न होने के कारण क्लेश कथा हो गई है।
भागवत कथा ही अब सभी रोगों की एक दवा है, ऐसा एजेंट लोग प्रचार करते हैं।
भागवत में कहीं भी ‘राधा’ शब्द नहीं है। महाभारत, गीता, हरिवंश पुराण में भी नहीं है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में यशोदा माता के भ्राता रायण की पत्नी ‘राधा’ को बताया गया है।
इस कारण यशोदा, कृष्ण की माँ तुल्य निर्माता होने के कारण श्रीकृष्ण की राधा मामी लगती हैं, और कृष्ण के जन्म के समय वे ३५-४० वर्ष की थीं। पर लंपट धारियों ने कृष्ण की प्रेमिका बताकर महायोगीराज कृष्ण के चरित्र का हनन किया है, जबकि महर्षि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में श्रीकृष्ण को आप्त पुरुष लिखते हैं।
यदि श्रीकृष्ण मुसलमानों के कालखंड में होते तो वह अकेले ही यवनों के धुर्रे उडा देते।
आज चाहे देवकीनंदन ठाकुर हों, अनिरुद्धाचार्य हों, रुद्रगिरी महाराज हों आदि अनेक धर्माचार्य, संत शिरोमणि, मण्डलेश्वर, महामंडलेश्वर या शंकराचार्य हों सभी के सभी वेद विरुद्ध बोलकर जनता को गुमराह ही कर रहे हैं। अभी थोड़े दिन पहले महाकुंभ को एक विहंगम दृष्टि में देख चुके हैं। जब जाति ही श्रेष्ठ हैं, तो इन तथाकथित ब्राह्मणों को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को रोकना चाहिए था कि निम्न जाति का अछूत संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष कैसे हो सकता है? उसे भारत रत्न देकर सरकार ने सम्मानित किया है, तो सरकार का भी विरोध होना चाहिए था।
हम जब प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे, तब अध्यापकों को ‘पंडित जी’ कहकर सम्मान दिया जाता था, चाहे वह किसी भी जाति का हो। मूर्खाधिराज नहीं जानते हैं कि ब्राह्मण जातिवाचक संज्ञा नहीं है, यह गुणवाचक संज्ञा है। शास्त्रोक्त तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र गुण, कर्म, स्वभाव से होते हैं, न कि जाति से।
राजा भोज अपने हस्तलिखित भोज प्रबंध में लिखते हैं:
विप्रोडपि भवनं मूर्ख: मूर्खश्चेदि बहिरस्तु मे।
कुंभकारोऽपि विद्वान स: तिष्ठतु पुरेममा।।
यदि विप्र होकर कोई मूर्ख है वह मेरे राज्य से बाहर चला जाये, और कुंभकार होकर विद्वान है तो मेरी नगरी में निवास करे।
विचार करें कि राजा भोज के काल में कितनी सुंदर व्यवस्था और प्रबंध होगा। स्यात् आज सरकार और समाज को भोज प्रबंध से कुछ सीखना चाहिए।

आज देश के शासक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछड़े वर्ग तेली जाति से हैं। देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आदिवासी ग़रीब परिवार से हैं। स्मृति शेष जगजीवन राम, जो विश्व में सर्वाधिक समय (१९४६ से जून १९७९) केंद्र में अनवरत केंद्रीय मंत्री रहे है सर्वाधिक सफल कर्मनिष्ठ मंत्री रहे है वे भी चमार (जाटव) जाति से थे, और पीछे देखो तो जाबालि पुत्र सत्यकाम, रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि, नाविक पुत्री सत्यवती (निषाद) के पुत्र महर्षि वेदव्यास का समस्त इतिहास आपके सम्मुख है।
इस वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के कारण वह घटना राजनीति के पैरोकारों ने रंग दे दिया है। ऐसी घटना सभी जगह होती रही हैं। अधोहस्ताक्षरकर्ता लेखक के साथ भी हुई हैं कि – आप तो जाट हैं, हम तो जाति से जो ब्राह्मण होगा, उसी से सब हवन इत्यादि कार्य कराएंगे।
इटावा में सर्वाधिक जो ग़लत हुआ है, वह जात पूछकर, चोटी कटवाकर, और पेशाब छिड़क कर जो कुकृत्य किया है यह क्षम्य नहीं है। ऐसे लोगों की उपेक्षा करके स्वयं विद्यावान बनकर अपने सभी कार्य स्वयं करना सीखें, तो अधिक श्रेयस्कर होगा।

ऐसा ही पहलगाम में धर्म पूछकर निहत्थे लोगों पर वार कर कुकृत्य किया था, तो सरकार ने ‘सिंदूर ऑपरेशन’ कर ब्याज सहित मूल को चुकाया।

अरे हिन्दुओ! जागो समझो समझो पहिचानो अपने को। यदि अब भी नहीं सम्भले, तो कब सम्भलोगे। यदि आप अपने को दूसरों से सुपर समझते रहे तो वह दिन दूर नहीं कि आप सब लोग इस्लाम और ईसाई की गोद में समा जाओगे।
याद रखो—
उठो, रामकृष्ण के बेटों! अब समय पुकार रहा है,
देशद्रोह का विषधर फन फैला फुँकार रहा है।
उठो, विश्व की सूनी आँखें, अब काजल माँग रही है,
आज अनेकों द्रुपद सुताएँ आँचल माँग रही हैं
मरघट को पनघट सा कर दो, जग की प्यास बुझा दो,
भटक रहे जो मरुस्थलों में, उनको राह दिखा दो।
जात-पात का ज़हर आज नस नस में डोल रहा है,
गले लगा लो अपनों को—अब समय बोल रहा है।
अब जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पडा रहन दो म्यान।।
आप काज महाराज, पराधीन सपनेहु सुख नाहि
विद्या सब धन की नायक है, विद्या के सब धन पायक है ।
जब देव सहाय नहीं होते, तब विद्या होत सहायक है ।।

शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
02 July 2025


