
आर्यावर्त भूमि (भूमण्डल) पर अनेक राजा महाराजा हुए हैं। सर्वाधिक सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राज-परिवारों का राज रहा है। अधिकांशतः शासक इक्ष्वाकु वंश के रहे हैं, परंतु हमें देखना समझना होगा कि राजवंश परंपरा से पहले मानव का जीवन व्यवहार किस प्रकार चलता था। वेद, उपनिषदों, मनुस्मृति आदि सद्ग्रंथों के स्वाध्याय से पता लगता है कि सर्वप्रथम सृष्टि के उद्भव के साथ जिन ऋषियों के हृदय में ज्ञान प्रस्फुटित हुआ उनमें ब्रह्मा आदि अनेकानेक ऋषि और ऋषिकाएं थे। वह ज्ञान विज्ञान श्रुति के माध्यम से अनवरत चलता रहा। जब -जब समाज में स्वार्थ के कारण गिरावट आ जाती है, वहीं से धर्म संस्कृति के अर्थ के अनर्थ होने लगते हैं। इस कारण लोग दिग्भ्रमित हो जाते हैं यही कारण है, समाज में विद्वानों की उपेक्षा और पाखंडी पोपलीला की सजावट से ही स्वादु होकर भी साधू से लगने लगते हैं और दिखते भी है।
समाज के अधिकांश लोगों की नस-नाड़ी को टटोलकर उन्हें अंधेरे में ही रखते हैं। वे जानते हैं कि उल्लुओं और चमगादड़ों को अंधेरा ही स्वर्ग लगता है, प्रकाश की किरण में वे चुँधिया जाते हैं। आज समाज में भी यही देखने को मिलता है।
महाभारत के बाद ठीक यही स्थिति लगभग दो हज़ार वर्ष तक ऐसे ही रही। कुछ दिन राजा जन्मेजय और परीक्षित महाराज तब कुछ कुछ ठीक रहा। परंतु जब हंस और वक (वगुला) के रंग को देखकर ही पहचानना हो गया तो ऐसे ही स्वादु वक समाज में छा गए। महर्षि चाणक्य और सम्राट चंद्रगुप्त के उपरांत तो ब्रह्म वाक्य जनार्दन ही कृण्वन्तो विश्वमार्यम बन गया अर्थात् ब्राह्मण के मुख से निकली बात को ईश्वर वाक्य माना जाने लगा। यही कारण राष्ट्र को नास्तिकता की ओर ले गया। पहले बौद्धमत और उसके साथ पिछलग्गू बनकर जैन मत प्रचलन में आया। यह मत भारत की सीमाओं को लांघकर सुदूर भूमंडल के अधिकांश भाग पर छा गया, यहाँ तक कि वेद का विलुप्तीकरण और वैदिक धर्म के कतिपय ही अनुयायी रह गये।

आज से लगभग २४०० वर्ष पूर्व दक्षिण देशस्थ नम्बूदरी पाद ब्राहमण के घर में एक बालक शंकर का जन्म हुआ। कहावत है कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं लोकोक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । २०-२२ वर्ष की अवस्था तक वेदोक्त अध्ययन कर इस आद्य शंकर ने ठीक १० वर्ष (अर्थात ३० वर्ष की अवस्था) में बौद्ध एवं जैन मत को भारत में से उखाड़ दिया। केवल मात्र एक जैनमत का बड़ा शासक महाराजा सुधन्वा ही शेष रह गया था जो जैन मत की नास्तिकता को मानता था। सारे आर्यावर्त में घूम-घूमकर विद्वानों और शासकों को अकाट्य तर्कों से प्रकाशित कर वैदिक धर्म का पुनः अनुयायी बनाया।

अंततोगत्वा आद्य शंकराचार्य ने राजा सुधन्वा के राज्य में वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार प्रारंभ किया। जिस समय महात्मा आद्य शंकराचार्य, राजा सुधन्वा की राजधानी में पहुँचकर वैदिक धर्म और वेदानुकूल कर्मों का उपदेश कर रहे थे, उसी समय किसी ईश्वर और ईश्वरज्ञान को न मानने वाले पुरुष ने महाराज सुधन्वा से जाकर कहा कि- महाराज! आज आपकी राजधानी में एक संन्यासी ईश्वर का अस्तित्व, उसकी प्राप्ति के उपायरूप कर्मों का उपदेश कर रहा है। राजा सुधन्वा ने उस पुरुष की बात श्रवण करके श्रीमान् शंकराचार्य को फाँसी का आदेश दे दिया। राजा की आज्ञानुसार राजकर्मचारियों ने तुरंत शंकराचार्य को राजाज्ञानुसार फाँसी के लिए तैयार रहने को कहा और राज नियम के अनुसार शंकराचार्य से यह भी पूछा कि आपको किसी भी पदार्थ की इच्छा हो तो कहिए? पूरी की जाएगी!धार्मिक शंकराचार्य ने कहा कि मुझे कुछ पदार्थ नहीं चाहिए। आप लोग अपना कर्तव्य पालन करो, हम फाँसी के लिए प्रस्तुत है। कर्मचारियों ने राजा से कहा कि शंकराचार्य किसी सांसारिक पदार्थ में इच्छा प्रकट नहीं करते।
अब जो आज्ञा हो सो पालन करें! इस प्रकार अपने कर्मचारियों से सुनकर राजा सुधन्वा ने कहा कि-शंकराचार्य से फिर पूछो कि आपकी इच्छा किसी वस्तु में हो तो कह दें। कर्मचारियों ने श्रीमान् शंकराचार्य के पास पहुंचकर फिर कहा कि राजा कहते हैं कि यदि आपकी किसी पदार्थ में रुचि हो तो कह दीजिए, राजा की ओर से पूरी की जाएगी। श्रीमान् शंकराचार्य ने कहा कि मेरी किसी भी सांसारिक पदार्थ में स्पृहा (इच्छा) नहीं है पर यदि राजा को मेरी स्पृहा सफल करने की इच्छा हो तो मैं कुछ काल महाराज सुधन्वा से वार्तालाप करना चाहता हूँ। राजकर्मचारियों ने राजा सुधन्वा को श्रीमान् शंकराचार्य का संदेश दे दिया।
अंत में आद्य शंकराचार्य महाराज सुधन्वा से वार्तालाप करने चले गए। राज दरबार में पहुँचते ही राजा सुधन्वा ने दूर से ही श्रीमान् शंकराचार्य को देखकर सिंहासन से उठते हुए कहा- शंकराचार्य, आप लोगों को ईश्वरोपासना सिखाते हो, और ईश्वर प्राप्ति के लिए उन्हें वैदिक धर्म और कर्मों में प्रवृत्त करते हो, कि जब हम मर जाएंगे, आपको उस समय यह ज्ञात हुआ, ओहो! ईश्वर तो नहीं है तो कहिए कि आपकी आत्मा को कितना क्लेश तथा पश्चाताप होगा? फिर आपके किए सब कर्म निष्फल हो जाएंगे।
महात्मा शंकराचार्य ने राजा के कथन को श्रवण कर कहा कि – राजन मेरा तो दृढ़ विश्वास है कि कर्मों का फल देने वाला परमात्मा है और सर्वत्र पूर्ण हो रहा है। इसलिए मैं उसकी स्तुति प्रार्थनोपासना कराता फिरता हूँ और उसी आधार पर मैं उसकी प्राप्ति के लिए वेद प्रतिपादित कर्मों का उपदेश करता हूँ। परम राजन आप तो कहिए? आप न यज्ञ करते हो, न ही ईश्वरोपासना करते हो, तनिक विचारिए तो सही कि यदि ईश्वर हुआ? तो आपकी आत्मा को स्वयं कितना क्लेश होगा, पश्चाताप होगा? अधिक शोक तो यह है कि उस समय तुरत फुरत कुछ कर भी नहीं सकते।
श्रीमान् शंकराचार्य के इस सारगर्भित कथन को श्रवण कर महाराजा सुधन्वा की आँखों के आगे से अंधकार का पर्दा हटा। उन्हें यह सोच उत्पन्न हुआ कि अहो! अब तक हम भ्रम में ही रहे।
शंकराचार्य सत्य कहते हैं कि श्रेष्ठ कर्मनुष्ठान से ही सद्गति प्राप्त होगी, क्योंकि कर्मों का ठीक-ठीक फल देने वाला परमेश्वर सर्वत्र विद्यमान है।
अधिक क्या लिखें शास्त्रार्थ में जैन आचार्य एवं जैन पुरोहितों को हराने के पश्चात महाराज की आत्मा पर आद्य शंकराचार्य का इतना प्रभाव पड़ा कि महाराज सुधन्वा ने जैन मत और नास्तिकता को तिलांजलि दे दी और वे सच्चे ब्रह्म के उपासक बन गए। जैन मत छोड़कर वैदिक धर्मी बनकर पुनः एक राजादेश से सभी को वैदिक धर्मी बना दिया। तभी से यह लोकोक्ति प्रसिद्ध हैं “यथा राजा तथा प्रजा!” यदि इतनी श्रम साधना उद्योग आद्य शंकराचार्य न करते तो आज क्या स्थिति होती? अर्थात दुख रूपी संसार समुद्र से पार होने के लिए उद्योग श्रम साधना करना मुख्य उद्देश्य है।
जिस अथर्ववेद के मंत्र ने महाराज सुधन्वा को प्रभावित किया यथा
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते। य एतं देवमेकवृतं वेद। ॥१६॥
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते य एतं देवमेकवृतं वेद।॥१७॥
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते य एतं देवमेकवृतं वेद।॥१८॥
स सर्वस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न। य एतं देवमेकवृतं वेद। ॥१९॥
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव। य एतं देवमेकवृतं वेद। ॥२०॥
सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति। य एतं देवमेकवृतं वेद। ॥२१॥
यह मंत्र अथर्ववेद के काण्ड १४, सूक्त ४, मंत्र १६-२१ में आता है, ईश्वर एक है , न दूसरा है, न तीसरा, न चौथा कहा जाता है। न पाँचवाँ है, न छठा, न सातवाँ कहा जाता है। न आठवाँ है, न नौवाँ, न दसवाँ कहा जाता है।
जो समस्त ब्रह्मांड में है और ब्रह्माण्ड उसके गर्भ में है। जो लोग नास्तिक हैं वे पामर है, ईश्वर सृष्टा भी है, दृष्टा भी है। वह सबको देखता है—जो जीवित हैं और जो नहीं हैं। वही शक्ति है, वही एक है, वही एकव्रत है, वही एकमात्र है। अतः हमें ब्रह्म की स्तुति प्रार्थना उपासना कर वेदोक्त कर्म करते रहने चाहिए।
इसके उपरांत भी जैन मत के दो साधुओं ने मात्र ३२ वर्ष की अवस्था में विषपान कराकर आद्य शंकराचार्य की जीवन लीला समाप्त कर दी। राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ महात्माओं को ऐसा दर्द बहुत लम्बे काल से उठाना पड़ रहा है। ईश्वर सबको सम्मति दें।
दिग्विजय सम्राट सुधन्वा सन ५००-४७० ई. पूर्व दक्षिणी अवन्ति के शासक थे। माहिष्मती नगरी उनकी राजधानी थी जो वर्तमान काल में मध्यप्रदेश के निमाड़ जनपद में महेश्वर नामक स्थान के रूप में ज्ञात हैं । सुधन्वा को विश्व सम्राट बनाने के पीछे आद्य गुरु शंकराचार्य की अशेष कृपा थी। आद्य शंकराचार्य की शिक्षा एवं सुधन्वा का पराक्रम एवं शौर्य (शास्त्र और शस्त्र) दोनो के गठबंधन ने सनातन धर्म ध्वजा को विश्व की चारो दिशाओ में लहराकर भारत विश्व विजय का स्वर्णिम इतिहास रचा था।
राजा सुधन्वा ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम यूरोप तक चारों दिशाओं को जीता था। युद्ध कला में पारंगत तलवार से वार की गति बिजली से भी तेज थी । आद्य शंकराचार्य से ज्ञान प्राप्त कर रणविद्या में पारंगत हुए थे सुधन्वा सम्राट, साथ ही वेदों से 18 युद्ध कलाओं के विषयों पर ज्ञान अर्जित किया था।
उनको २० प्रकार की घुड़सवारी युद्धकला आती थी। हाथी, अस्त्र-शस्त्र संचालन, व्यूह रचना, युद्ध नेतृत्व, आदि तकनीक के ज्ञाता थे। युद्ध के कई तरीकों में पारंगत थे जैसे मल्ल युद्ध, द्वन्द्व युद्ध, मुष्टिक युद्ध, प्रस्तरयुद्ध, रथयुद्ध, रात्रि युद्ध।
राजा सुधन्वा व्यूह रचना में भी पारंगत थे जिससे सेना को व्यवस्थित ढंग से खडा किया जाता था। इसका उद्देश्य अपनी कम से कम हानि में शत्रु को अधिक से अधिक नुकसान पंहुचाना होता था। इनमें से कई तकनीक सुधन्वा महाराज अपने शासनकालीन जीवनकाल में इस्तेमाल में लाये जैसे बाज़, सर्प, बज्र, चक्र, काँच, सर्वतोभद्र, मकर, ब्याल, गरूड व्यूह आदि का इस्तेमाल उन्होंने युद्ध में किया था।
सम्राट सुधन्वा ने सन ४९८ (498) ई.पूर्व ग्रीस के शासक थाईमोएतेस (Thymoetes) से युद्ध किया था। इस युद्ध का वर्णन “Battle of Thunder” के नाम से किया जाता है। कहा जाता हैं इस युद्ध में ग्रीस एथेंस की भूमि में दोनों सेनाओं ने इस तरह युद्ध लड़े थे जैसे बिजली आसमान से गिरकर भूमि से टकराती है।
सुधन्वा की सेना ने थाईमोएतेस (Thymoetes) को पराजित कर एथेंस ग्रीस पर कब्ज़ा किया एवं थाईमोएतेस (Thymoetes) के अधीन जितने भी राज्य आते थे जैसे बुल्गरिया, मैसिडोनिया, एवं ग्रीस जो उस समय दक्षिण यूरोप की राजधानी हुआ करता था उन सबको जीत लिया था।
सुधन्वा की सेना से विश्व के सभी शक्तिशाली साम्राज्य भी थर्राते थे। अश्शूर राज नाबोनिदास की ५ लाख की विशाल सेना को परास्त कर सुधन्वा ने अश्शुरों को यूफ्रेटस नदी के पार तक खदेड़ा। सुधन्वा ने अब मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, एलाम, फ्रूगिया, पर्शिया एवं यूफ्रेटस नदी एवं मिस्र (Egypt) टाईग्रीस नदी के पार सनातन वैदिक ध्वज को लहराकर इस अश्शूर राज्य को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।
इस बात का उल्लेख “The History of Archaeology Part 1”, “Babylonia from the Neo-Babylonian empire to Achaemenid rule” इन दो पुस्तकों में लिखा हैं।
इतिहासकार Hurst, K. Kris लिखते हैं “The sword of South Asian King dynasty of Luna defeated Assyrian ruler Nabonidas and the King of South Asia became the reasons for the decline and downfall of Assyrian Kingdom” (चन्द्र का अन्य नाम लूना है। चन्द्रवंशी राजा का उल्लेख किया गया है। दक्षिण एशियाई राज्य का उल्लेख है जो भारतवर्ष है)।
सुधन्वा ने फ्रांस, रूस, सर्बिया, क्रोएशिया, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी, प्रशिय एवं समूचे यूरोप पर भगवा ध्वज लहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य यूरोप तक फैलाया था।
विश्व विजयी सम्राट सुधन्वा ने अफ्रीका, यूरोप, एशिया (चीन, जापान, इत्यादि) समेत समूल धरा पर सनातन धर्म ध्वजा फहराकर भारतवर्ष का साम्राज्य विस्तार किया था। आद्य शंकराचार्य के निर्देषानुसार अश्शुरो, यवनों एवं यूनानीयों के अत्याचारों से भारत एवं पृथ्वीवासियों को मुक्ति दिलाकर सुधन्वा एक पराक्रमी शौर्यशाली योद्धा बने थे।

श्वासों का उद्देश्य कर्म है थक कर क्यों मर जाएँ ।
मरने से पहले कुछ कर लें, याद सभी को आएं॥
शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
04 August 2025


