
१.
मनुष्य का आत्मा सत्या सत्य का जानने हारा है, तथापि अपने प्रयोजन की सिद्धि हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य पर झुक जाता है – सत्यार्थ प्रकाश

२.
शिक्षा जो जन समुदाय को जीवन संग्राम को उपयुक्त नहीं बनाती जो चारित्र्य शक्ति का विकास नहीं करती जो उनमें भूत और दया का भाव नहीं रखती और सिंह जैसा साहस पैदा नहीं करती क्या उसे भी हम शिक्षा का नाम दे सकते हैं- स्वामी विवेकानंद

३.
यदि तुम पढ़ो तो भारत मां को पढ़ो , उसकी सेवा के लिए शरीर मन आत्मा के लिए समर्थ बनाओ। जीविका इसलिए कमाओ कि तुम मां को जीवित रह सको। विदेश जाओ तो वह ज्ञान ला सको जो मां (भारत) की सेवा हो सके। कष्ट भी सहो ताकि मां प्रसन्न रह सके – योगी अरविंद

४.
अष्ट चक्र नव द्वारा देवानां पूरयोध्या यह आठ चक्र और नौ द्वारों वाली मेरी शरीर रूपी देवपुरी (अयोध्या ) है ।
अतः इस मंत्र मे दो उपदेश हैं पहला यह कि हम अपनी सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियां एवं कर्मेंद्रियों से जो जाने व करें वह यज्ञ रूप में है । दूसरा विचार है कि उत्तम विचार एवं आचार के हम इतने अभ्परन्त हो जाएं कि सम्पूर्ण दिव्य भाव अपने निवास के लिये हमारी इस शरीर पुरी को प्रसन्नता एवं उत्सुकतापूर्वक अपने निवास के लिए चुनें ।

५.
अद्या हमारे सह्व्य: समान
कल तक जो जीवित जागृत था जिसकी योग्यता और परिश्रम का सिक्का उस समय का संसार मानता था आज वह मरा पड़ा है। बुड्ढा सफेद बालों वाला परमात्मा जवानों को निगल रहा है।
श्री कृष्ण जैसे प्रतापी आप्त पुरुष प्रत्युत्पन्नमति महापुरुष जिन्होंने नितांन्त विकृत भारत के चित्र को काट छांटकर भारत को महाभारत बनाया और मर्यादित किया अंन्त में जंगल में लेटे हुए एक बहेलिए के तीर से घायल होकर उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त की – आर्ष ग्रन्थ

६.
मां देव शक्तियों से भी समृद्ध है, पत्नी महाशक्ति से भी महाबली है।
बहन स्नेह सम्बन्ध की पराकाष्ठा है, आतिथ्य घर का वैभव है ।
प्रेम घर की प्रतिष्ठा है, पति-पत्नी गृहस्थ रथ के चक्र हैं।
अतः दोनों चक्रों का सामन्जस्य गृहस्थ का सार्वभौमिक शाश्वत सुख है। – आर्ष मन्त्र
७.
उत्तेजनात्मक हथकण्डों की उम्र कम होती है। उत्तेजनात्मकता आदमी को समाप्त कर देती है। जिस प्रकार गर्मी पानी को समाप्त कर देती है। पानी का गुण शीतल है अतः मनुष्य शीतलता के गुण से भी अपनी आयु को दीर्घ एवं निरोगी बना सकता है।- आर्ष ग्रंथ
८.
वस्तुत: जगत पीला नहीं है किंन्तु हमें पीतिया हो गया है अतः जगत पीला दिखाई देता है।
जगत में सत्य की सत्ता नहीं है असत्य हमारी दृष्टि में ऐसा समा गया है वही जगत में दिखाई पड़ता है। जगत में कोई खोटा सिक्का चलाए तो उसे रोकना अपने बस की बात नहीं है पर अपनी तिजोरी में खोटा सिक्का न आ जाए इसका ध्यान रखना है। खोटा सिक्का अपने आप रूक जायेगा।
९.
ओऽम् सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु, सहवीर्यम् करवावें।
तेजस्वी नावधीतमस्तु, मां विद्विषा वहे।”
हे ईश्वर हम दोनों मिलकर एक दूसरे की रक्षा करें।
हम मिलकर सांसारिक एवं पारलौकिक सुख भोगें।
हम मिलकर बल, श्रृद्धा और यश बढ़ाएं जो ज्ञान विज्ञान सुनते पढ़ते लिखते उसे सीमित न रखकर सारे संसार में बढ़ाएं। हममें द्वेष कटुता कभी न आए। – वेदमन्त्र अनूदित

१०.
सत्यार्थ प्रकाश उस वैद्य के समान है जो एक हाथ से औषध की बोतल और दूसरे हाथ में रोगी के लिए पथ्य लिए खड़ा है। यदि उत्तरार्द्ध औषध है तो पूर्वाद्ध पथ्य है।- ऋषि उद्धृत
११.
स्वाभाविक मां के पेट से निकला बच्चा कृत्रिम दशा से पैदा होने वाले बच्चों से अधिक पवित्र होता है।
वे जीव जिन्होंने सृष्टि के आदि में अमैथुनी शरीर धारण किए थे उनसे पवित्र बुद्धि रखने वाले दूसरे मैथुनी जीव हो ही नहीं सकते। आदि सृष्टि के जीवों में (मनुष्य) किसी भी प्रकार के धब्बें नहीं थे। अतः अमैथुनी सृष्टि से उत्पन्न ऋषियों की मेधा (प्रज्ञा) मैथुनी सृष्टि से उत्पन्न ऋषि कभी नहीं कर सकते।- महर्षि दयानंद
१२.
हे धृतराष्ट्र ! मीठी चिकनी बातें करने वाले चाटुवादी बहुत हैं किंतु पथ्य रूप कल्याण कारी वचन कहने वाले और सुनने वाले दुर्लभ हैं।
चाटुवादिता का नाम उपदेश नहीं है। उपदेश का काम मूर्खता की बोदी भित्ति को खण्डन के तीक्ष्ण शस्त्रों से गिराकर मण्डन के मसाले से नवीन मंन्दिर का निर्माण करना है
– उद्योग पर्व विदुरमीति दृष्टव्य को उद्धृत करते हुए ऋषि का मन्तव्य
१३.
योग शास्त्र के अनुसार चार प्रकार के मनुष्य हैं उनसे वैसा ही वर्ताव करें।
१. सुखी जन से मित्रता का वृत्ति रखो।
२. पुण्यात्मा जन से मन में आनन्दित रहो।
३. पापी से उपराम वृत्ति हो।
४. दुखी पर दया वृत्ति धारों।

१४.
तीन समिधा क्यों? चार मंत्र क्यों ?
घी में डुबोई तीन समिधाओं को अग्नि में रखते समय जो मंत्र बोले जाते हैं उन्हें सामधेनी मंत्र अथवा ऋचाऐं कहते हैं।
आरण्यक आचार्य कहते हैं कि विश्व ब्रह्मांड में चलने वाले ईश्वरीय
यज्ञ में पृथिवी ,अंतरिक्ष और द्यौ तीन समिधाएं हैं।
१. पृथिवी नामक पहली समिधा के लिए अग्नि सामधेनी ऋचा है।
२. अंतरिक्ष नामक समिधा के लिए वायु और विद्युत ये दो सामधेनी ऋचा हैं।
३. द्यौ नामक समिधा के लिए आदित्य सामधेनी ऋचा है। अतः ईश्वरीय यज्ञानुसार तीन समिधा एवं चार मंत्र हैं। – आर्ष ग्रन्थ

१५.
सर्वप्रथम ईश्वरीय वेदोक्त उपदेश
रसना उत्तम अन्न चखती हुई उसे स्वीकार करती है परंन्तु विष के चखने पर उसे कदापि स्वीकार नहीं करती।
अमाशय जहां अन्न को पचाता है वहां विष को नमन अथवा विरेचन के द्वारा अपने से पृथक करता हुआ अरुचि प्रकट करता है।
कान यदि सुरीले राग को आकर्षण करते हैं तो भयंकर शब्द या रुदन से घबराते हैं। नाक यदि सुगन्ध को ग्रहण करती है तो दुर्गंध से बचना चाहती है।
प्रत्येक इन्द्रिय अपनी प्राकृतिक दशा का अनुकूल तथा प्रतिकूल का त्याग करने को उद्यत है। पर इन इन्द्रियों से बढ़कर एक और प्रधान इन्द्रिय है जिसका नाम बुद्धि है जो आत्मा को आत्मिक अर्थों को ग्रहण करने या न करने में सदा सहायता करती है।

मन्तव्य और सिद्धान्त इसी प्रधान इन्द्रिय के सम्मुख प्रस्तुत किए जाते हैं उनमें से जो आत्मा के भोग्य के योग्य हैं उनको यह स्वीकारती है और जो विष के तुल्य हैं उनका त्याग कर देती है।
परन्तु पिछले पांच सहस्त्र से प्रधान वृत्ति को मतमतान्तरवादियों ने ज्ञान में घूंस (रिश्वत) देकर आत्मा की भीतरी आंख को फोड़ कर पाखण्ड फैला दिया है।
संसार का वैदिक धर्म एक ही धर्म है जो आत्मा की आंख को (बुद्धि) को फोड़ना नहीं चाहता।
जिनके आत्मिक चक्षु फूट गए हों और वैदिक सिद्धांतों को ने समझ सके तो इसमें वेदों का कोई दोष नहीं है।- युग प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती

जब पन्नाधीश कन्या के रजोदर्शक का पता नहीं रख सकता तो विवाह की तिथि कैसे निश्चित कर सकता है। इसका पता कन्या की माता रखती है और उसी का अधिकार है कि वह अपनी कन्या की वैवाहिक तिथि निश्चित करे। किसी भी पन्नाधीश को विवाह की तिथि निश्चित करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यह नारी के साथ घोर अन्याय एवं समाज की प्रोन्नति को पतन की ओर ले जाना है।
अनूदित वेदमन्त्र – दयानन्द
शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
01 Sept 2025


