हास्य कवि काका हाथरसी ने आज से लगभग ७०-८० वर्ष पूर्व हास्य व्यंग्य में लिखा है कि-
कुर्सी तू बड़ी भागनी, कौन तपस्या कीन।
मंत्री, नेता, अफसर, सब तेरे आधीन।।
सैकड़ों हजारों लाखों लाख वर्षों से ऐतिहासिक तथ्यों से विदित होता है कि सत्ता में रहने वाले लोगों की चमड़ी इतनी मोटी हो जाती है कि उन्हें दिखना भी बन्द हो जाता है। अब तक हम कभी मुगल शासकों को, कभी अंग्रेजों को, और राष्ट्र को स्वतंत्र होते ही हम कांग्रेस को कोसते और कचोटते रहे हैं कि मुगलों ने बहुत अत्याचार किया, अंग्रेजों ने भी दो सदियों तक लूट मचाई और खूब अत्याचार किया। देश स्वतंत्र होते ही कांग्रेस भी लूट खसोट में पीछे नहीं रही और अब तो हम कांग्रेस मुक्त भारत की बात भी करने लगे हैं।
जिस तरह कांग्रेस की सत्ता में चाटुकार रसमलाई खा-खा कर देश के प्रधानमंत्री के नवरत्न बनने की होड़ में, दिन को दिन कहने में दिल हिचक रहा था, देश के स्वतंत्र होते ही प्रथम प्रधानमंत्री ने देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की उपेक्षा करना प्रारम्भ कर दिया था। यह सब सत्तानशीन होने का नशा था। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जैसे महामहिम को भी दर किनार कर दिया। जिस किसी नेता ने उचित और अनुचित पर ध्यान आकृष्ट किया उसी को सत्ता और मंत्रिमण्डन से बाहर कर राजनैतिक बनवास का रास्ता दिखा दिया जिससे अन्य नवरत्न खूंटे से चुपचाप बंधे रहें।
उसकाल खण्ड के दो देदीप्यमान नेता पूर्व मुख्यमंत्री चंदन गुप्त एवं चौ. चरण सिंह थे। उनको भी नेपथ्य में डाल दिया। चौ. चरण सिंह तो अप्रेल १९५९ में नागपुर में सहकारिता सम्मेलन में किसानों के विरुद्ध बनायी नीतियों के कारण ही प्रथम निशान’ पर आ गय थे उसके बाद उसी ढर्रे पर उनकी पुत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी भी चली।
१९७५ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में आपातकाल (इमरजेंसी) लागू कर उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के फैसले की अवमानना करके संविधान तक में संशोधन कर अपनी तानाशाही को स्थापित किया और १९७६ में भी संविधान में एक और संशोधन धर्म निरपेक्ष शासन से मुस्लिम तुष्टीकरण की नीव को मजबूत किया। पंथ निरपेक्ष तंत्र को धर्म निरपेक्ष तंत्र में बदल दिया। जब कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी लिखते हैं कि धर्म के बिना तो राजनीति निष्प्राण है। यह अवश्य है कि नेहरू जी अपने समय के वैश्विक नेता थे यदि कूटनीति से काम करते तो तिब्बत, भूटान, नेपाल और बर्मा (म्यान्मार) यह हमारे राज्य होते। इन्होंने भारत के साथ रहने का प्रस्ताव किया था।
बर्मा तो १९३५ में ही अलग हुआ, उस समय प्रथम पंक्ति के नेताओं की बहुत बड़ी चूक थी इसे भूल नहीं माना जा सकता। यह घोर अनर्थ अर्थात ब्लंडर की श्रेणी में आता है। आज चीन हमें आँख नही नटेरता। आज की सरकार भी चीन को लाल कालीन बिछा रही है।
एक ही परिवार का शासन दीर्घावधि रहने से सभी राजकीय / अराजकीय योजनाएं केवल और केवल नेहरू, इन्दिरा, राजीव और संजय के नाम से स्थापित रही थी। स्वयं राष्ट्रपिता गांधी के नाम से भी योजनाएं कम थी। क्या कांग्रेस के शासन में सरदार पटेल, डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. भीमराव अम्बेडकर, गोविंद वल्लभ पंत, आचार्य नरेन्द्र देव, भगत, बिस्मिल, चंद्रशेखर, सुभाष, दुर्गा भाभी, नीरा आर्य, मंगल पाण्डे आदि जैसे सच्चे राष्ट्र भक्तों का कोई योगदान नहीं है। बाबा तुलसी दास ने ठीक ही लिखा है – प्रभुता पाय कौन मद नाहीं अर्थात सत्ता की शक्ति हम अंधे ही नहीं ओछे और बौने भी हो जाते हैं।
सब जानते हैं कि महाभारत का क्या परिणाम हुआ। इस मान गुमान और दम्भ में रावण और कंस, दुर्योधन जैसे लोगों का क्या हस्र हुआ। सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानंद दुर्योधन को गोत्र हत्यारा लिखकर सम्बोधन करते हैं। राजीव गांधी, श्री नरसिम्हा राव और डा. मनमोहन सिंह को छोड़कर अन्य प्रधानमंत्री महानुभावों का अल्प समय शासन रहा अत: उनके शासन पर अंगुली उठाना उचित नहीं है। यहाँ तो मनमोहन सिंह जैसे योग्य व्यक्ति को भी कठपुतली बनाए रखा वे भी नेहरू परिवार का अहसान ही चुकाते रहे।
देव पुरुष लाल बहादुर शास्त्री के असामयिक निधन के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी। अपने कालखण्ड चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजा महाराजाओं के प्रिवी पर्स (Privy Purse) समाप्त करना, भारत में सिक्किम देश को मिलकर एक कीर्तिमन स्थापित किया, साथ ही १९७१ के पाक युद्ध में पाक को दो टूक उत्तर देकर पाकिस्तान के दो टुकड़े कर देना अर्थात् बांग्लादेश बना देना, बहुत ही शिरोमणी कार्य किया। इसी सूझबूझ से वे भारत की लौहमहिला (Iron Lady) बनी। परन्तु सदैव तानाशाह के रूप में ऐसी कांग्रेस खड़ी की अब नेहरू की कांग्रेस से अधिक चाटुकार चापलूस इस तरह आस्तीन के सांप बनकर नारे लगाने लगे। इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरुआ का उद्घोष था ।
उस समय बाबू जगजीवन राम, स्वर्ण सिंह, यशवन्त राव चव्हाण, ठा. दिनेश सिंह जैसे नेता भी बौने हो चुके थे। जून १९७५ में इमरजेंसी लगा कर देश के सभी छोटे बड़े नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया। यही इमरजेंसी के कुचक्र ने उन्हें सत्याच्युत भी कर दिया। इस तरह उनका भी मान गुमान और अभिमान मिट्टी के ढेले की तरह बह गया।
इसी श्रृंखला में बहुत लम्बे संघर्षोपरान्त भारतीय जनता पार्टी जो कभी जनसंघ कहलाती थी का शासन स्वर्गीय अटलबिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में स्थापित हुआ। स्पष्ट बहुमत न मिलने पर भी वे सरकार और शासन पर कुछ अंकुश लगाने मे सफल हुए साथ ही विरोधीदल के भी प्रिय बने रहे। पोकरण में परमाणु विस्फोट करके अमेरिका की चौधराहट पर भारी पड़े। उनकी भाषा शैली ओज और लच्छेदार भाषणों की ऐसी धाक थी कि पक्ष-विपक्ष उनकी इस प्रतिभा का कायला था।
सन २०१४ में राष्ट्र में एक अद्भुत सफलता में बसंत कुसुमाकर अर्थात् कमल खिला और भाजपा का नेतृत्व जमीनी कार्यकर्ता गुजरात का नायक मुख्यमंत्री पिछडे वर्ग से चाय बनाने वाले को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। प्रारंभिक वेला में ऐसे संदेश दिए गये कि अब अच्छे दिन आने वाले हैं। जनता की अपेक्षाएं बहुत थी जनता कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों से ऊब चुकी थी। ऐसा लगने लगा था कि कोई राजनैतिक अवतार अब हमें कष्टों से निजात देगा। धीरे धीरे कुछ शासन की झलक दिखने भी लगी। पांच सौ वर्षों से अटका हुआ राम मन्दिर का निराकारण अदभुत दूरदर्शिता का राजनैतिक सोपान है। तीन तलाक से छुटकारा दिलाना, नारी उत्पीड़न से निजात दिलाना और इस्लाम के कठमुल्लापन से निर्दोष बेटियो को सामाजिक न्याय सम्मान दिलाना एक ऐतिहासिक कदम है।
जम्मू कश्मीर को ३७० धारा से मुक्त करना भी एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसे देश में एक ऐसा कलंक समझा जाता था। ३७० के हटने से श्यामाप्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, प्रकाशवीर शास्त्री, अशोक सिंघल आदि अनेकानेक संघर्षशील जुझारु नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित हुई । इन्हीं नेताओं ने सर्वप्रथम उद्घोष किया कि एक राष्ट्र में दो प्रधान, दो विधान और दो निशान नहीं होंगे। साथ ही देश में साम्प्रदायिक दंगों में भी गिरावट हुई। कुछ शासन में स्वच्छता के सोपान भी प्रकट हुए। परन्तु सत्ता में रहते हुए सरकारी अफसर ऐसे हावी हो गये कि उन्हीं अधिकारियों ने नेताओं को पटा लिया। नेताओं ने जनता और विरोधी दलों को दर किनारे कर अफसरों के ही चहेते बन गये। अब सता में बैठे नेताओं को नजर आने लगा है कि जो सरकार का विरोध करे वह राष्ट्र विरोधी है, संगठन विरोधी, धर्म विरोधी है, यह सनातन विरोधी है, अब हिन्दू की जगह, सनातन की दुहाई दी जा रही है। टी. वी. चैनलों पर सनातन पर बहस करायी जा रही है। सनातन शब्द की गहराई क्या है ? यों तो सभी पंथ अपने को सनातनी कहते हैं चाहे वह इस्लाम हो, ईसाई या यहूदी, पारसी हों, वे सभी अपने को प्राचीन (सनातन) मानते हैं जबकि सबसे पुराना है वेद। अतः वेद ही मूल है-वेदोखिलो धर्ममूलम् अर्थात वैदिक धर्म, यही सनातन है शेष सब तनातन है, जबकि गोदी सनातन के बारे में क ख ग भी नहीं जानता है।
आज भाजपा सरकार भी उसी कांग्रेस के ढर्रे पर आ गई है अब केन्द्र में भी नेता का चयन संसदीय बोर्ड नहीं करता है अपितु अपने चाटुकारों से अपना नाम प्रस्तावित कराया जाता है। अच्छे दिन लाने वाले प्रधानमंत्री का चयन भी एक घिसी पिटी परम्परा है। राज्यों के मुख्यमंत्री अब नेता के बतौर नहीं चुने जाते वरन् उनके नाम की पर्ची दिल्ली की सल्तनत तय करती है। कोई भी विरोध नहीं करता। यह कहकर कि हमने अंतिम पायदान के जमीनी कार्यकत्ती को भी अवसर दिया है। यह भाषण देकर श्रेष्ठ और ज्येष्ठ के अनुभव को दर किनार करके उपेक्षा की जा रही है। किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष हो या प्रादेशिक अध्यक्ष, सभी को २०२७ और २०२९ के चुनावी राजनीति के कारण तय किया जा रहा है। जैसे कांग्रेस में सभी योजनाएं नेहरू, इन्दिरा, राजीव और संजय गांधी के नाम पर चल रही थी ठीक उसी प्रकार आज भाजपा सरकार भी अधिकांशत: योजनाएं श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर चला रही है। अटल बिहारी के नाम पर तो लगभग पंचपन योजनाएं चल रहीं हैं। अटल योजनाओं ने तो मुखर्जी योजनाओं को बहुत भी पीछे छोड़ दिया है यही भाजपा का कांग्रेसीकरण है। प्रेरणा स्थल लखनऊ में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी की बड़ी-बड़ी तीन प्रतिमाएँ लगाकर प्रेरणा स्रोत बताया गया है। काश इन प्रतिमाओं के साथ गोविंद वल्लभ पंत, लाला लाजपत राय, गुरू गोविंद सिंह, दुर्गा भाभी, नीरा आर्य, भगत सिंह दादाश्री अर्जुन सिंह, श्यामजी कृष्ण वर्मा, स्वामी श्रद्धानन्द, पंडित मदन मोहन मालवीय, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की प्रतिमा होती तो हम पूर्णतः पंथ या दल निरपेक्ष होते।
आज सनातन संस्कृति की दुहाई देकर अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य भी सनातन सिद्धान्तों को छोड़कर शासन प्रशासन को चुनौती दे रहे हैं, जबकि मनुस्मृति धर्म की चर्चा में निम्न श्लोक को उद्धृत करती है।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
समाज और संसार को दिशा देने वाले ही क्रोध से अपने ज्ञान का क्षरण करेंगे तब बाबा तुलसी की चौपाई बड़ा सुन्दर संदेश देती है
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जिहिं आचरहिं नरम घनेरे॥
दूसरों को उपदेश देना तो बहुत लोग जानते हैं, लेकिन उसी उपदेश को अपने जीवन में आचरण में उतारने वाले बहुत कम होते हैं।
आज आवश्यकता है कि आधुनिक शंकराचार्य, आदि शंकराचार्य जैसे तपस्वी साधक बनें जिन्होने आज से लगभ २४०० वर्ष पहले एक संवाद में सम्राट सुधन्वा का हृदय परिवर्तित कर पूर्ण वैदिक धर्मी बनाकर सत्य सनातन की रक्षा की। आइये हम यदि सच्चे सनातनी बनना चाहते हैं हो तनातनी को छोडें इस समय राष्ट्र को बचाने का संकल्प लें। आज राष्ट्र को सनातनी नेतृत्व की आवश्यकता है तो सब मिलकर त्यागी, योगी, सन्यासी, समदर्शी का सहयोग करें। अब उस विश्वामित्र की आवश्यकता नहीं है जिसे राम लक्ष्मण की आवश्यकता पड़ी। अब स्वयं राम-लक्ष्मण बनने की आवश्यकता है।
जमा हुआ घी कभी सीधी अंगुली से नहीं निकलता वहाँ भी अंगुली टेढ़ी करनी पड़ती है। इसी श्रृंखला में आज योगी जैसे नायक की आवश्यकता है तभी आपका वैदिक धर्म (सनातन) सुरक्षित रह सकता है
भूख लगना आदमी की प्रकृति है,
छीन खाना आदमी की विकृति है।
सब मिल कर चलें व चलायें,
यही सनातन संस्कृति है॥
शुभेच्छु
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०
उत्तर प्रदेश
चल दूरभाष – ९७८३८९७५११
28 Jan 2026


