महर्षि दयानंद सरस्वती कृत ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्रों में छठवां मंत्र है कि
ओ३म् प्रजापते त्वदेतान्यानो विश्वा जातानि परिता वभूवा।
यत्कामास्ते जूहूमस्तन्नो अस्तु वयं स्यामपतयोरयीणाम्।
हे ईश्वर वयं स्यामपतयोरयीणाम् का अर्थ एवं गूढ़ार्थ है कि हम धन ऐश्वर्य के स्वामी बनें अर्थात् संसार में चार पुरुषार्थ हैं वेदों के अनुसार धर्म अर्थ काम मोक्ष।
यहां अर्थ को दूसरे क्रम पर रखा गया है। ॠत् सत्य का पालन करते हुए अर्थ प्राप्त करना ही धर्म संगत है। ॠत् और सत्य सिद्धांत हैं धर्म उसका प्रयोग।
किसी कवि ने बहुत अच्छा काव्य किया है……..
धन खूब कमा आनंद मना, पर ऐसा कोई काम न कर ।
आबाद घर अपना करने को, औरों का घर बर्बाद न कर ।
सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के सौ से अधिक ईश्वर के नामों की चर्चा है।
उनमें एक नाम लक्ष्मी भी है। लक्ष्मी का ही नाम धन है अर्थात् – अर्थ।
वैदिक साहित्य में अर्थ प्राप्त करना भी एक बौद्धिक सम्पदा है। किसी से एक गुणा प्राप्त कर दस गुणा देने के योग्य बनना चाहिए। भूत में किया गया पुरुषार्थ कार्य कहलाता है। भविष्य में योजनाबद्ध पुरुषार्थ कर्तव्य कहलाता है। इस कार्य और कर्तव्य के बीच में जो श्री वृद्धि की जाती है और जीवन की लता को उन्नत करना ही अर्थात् चहुमुखी विकास करना ही पुरुषार्थ का अद्वितीय लक्षण अर्थ है।
शत हस्त समाहर सहस्त्रहस्त संकिर। अथर्व० ३.२४.५
अर्थात् पवित्र कमाई ही सर्वत्र विचरण करें।
रमन्ता पुण्या लक्ष्मी। अथर्व० ७.११५.४
धन को भी वेद ने ऐश्वर्य कहा है। राष्ट्रीय प्रार्थना में अर्थ को सुभगा कहा है।
इन्द्र श्रेष्ठानि द्रवणानि धेहि, चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे। ऋग० २.११.६
वेदों में कृषि को समुन्नत बनाने की बात कही गई है। यजुर्वेद में राजा (शासक) के चार प्रमुख कर्तव्यों मे रक्षा ,कृषि ,न्याय और व्यापार हैं जिसमें कृषि को प्रथम स्थान पर रखा गया है।
वेदों के आधार पर ही महर्षि दयानन्द ने किसान को राजाओं का राजा बताया है। ऋषि और कृषि की उपेक्षा से ही देश पांच हजार वर्ष पीछे चला गया है। राष्ट्र में राजा हो या रंक सभी को अन्न की आवश्यकता होती है शरीर का भोजन अन्न है इसीलिए उपनिषदों में अन्न को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। महाभारत में दुर्योधन का दूषित अन्न प्राप्त करने पर ही आदित्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी तात् श्री भीष्म पितामह एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं –
जैसा होगा अन्न ,वैसा होगा मन्न।
जैसा होगा मन्न ,वैसा है सजन्न।
महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि महाभारत काल से एक हजार वर्ष पूर्व से ही ऋषि और कृषि संस्कृति की उपेक्षा होने लगी थी। कृषि हमारी जी.डी.पी का मुख्याधार है परन्तु किसानों को चन्द्रगुप्त और चाणक्य के बाद जमकर लूटा है अतः कृषि अर्थ प्रधान बनाने के लिए बहुत बड़ा काम दीनबन्धु छोटूराम ने किया था।
पंजाबी में किसान को सम्बोधित करते हुए उनके बड़े कड़वे बोल थे
पगड़ी संभाल जट्टा पगड़ी संभाल रे।
लुट गया माल तेरा लुट गया माल रे।
फैक्ट्री में माल बने तो भाव को फैक्ट्री तय करे और कृषि में किसानी करे किसान और खेत के माल का भाव तय करें सरकार और व्यापार।
वेद और महर्षि दयानन्द की बात आगे बढ़ाने वाले किसान नेता के रूप में खेत में खड़े होकर अपने भाषण में प्रथम बार परतंत्र भारत में चौधरी चरण सिंह ने कहा कि कृषि इस राष्ट्र की रीढ़ है। राष्ट्र की रीढ़ ही नहीं होगी तो राष्ट्र अधिक दिन नहीं चलेगा और अंतिम पंक्ति में जो कहा देश की खुशहाली का रास्ता खेत और खलिहानों से होकर जाता है,
वेदों में कृषि को अर्थव्यवस्था का आधार मानते हए तैत्तिरीय संहिता में अर्थ का आधार कृषि की मुख्य दो फसलों को शारदीय (खरीफ) एवं वासंती (रबी) का उल्लेख मिलता है।
द्वि: संवत्सरस्य सस्यं पच्यते। (तै.सं.५.१.७.३)
इसी प्रकार गणित ज्योतिष में भी शारदीय सम्पात् और वसन्त सम्पात् खगोलीय वैश्विक घटना का भी सूर्य, चन्द्र एवं पृथ्वी सापेक्ष कोणीय गणना भी कृषि पर प्रभाव डालती है।
यजुर्वेद के अनुसार व्रीहि (धान), यव (जौ), अरहर, उड़द, मटर, तिल, नारियल, मुग्द (मूंग), खल्व (चना), प्रियंगु (कन्गुनी ), अणु (पतला चावल), श्यामक (समा), नीवार (कोंदोतिन्नी धान), गोधूम (गेहूं), मंसूर आदि कृषि से प्राप्त पंद्रह अन्नों के नामों का उल्लेख मिलता है।
व्रीहयश्च में यवाश्चमे तिलाश्चमे मुग्दाश्चमे खल्वाश्चमे प्रियंगवश्चमे अणवश्चमे।
श्यामाकाश्चमे नीवारश्चमे गोधूमाश्चमे मसूराश्चमे यज्ञेश कल्पन्ताम्।। यजु० १८.१२
सभी प्रकार के अन्नों से हमारी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है। इसी प्रकार सभी प्रकार के फलों, उनके बीज छिलका पत्ती से भी अन्नोत्पादन की तरह यह भी अर्थव्यवस्था का मुख्याधार है। पेड़-पौधे बड़े-बड़े विशाल वृक्षों से हमें लकड़ी (काष्ठ) के रूप में बहुत बड़ा व्यापार है । इसीलिए प्रत्येक सरकार एवं समाजसेवी संगठन प्रत्येक व्यक्ति से आवाहन करते हैं कि एक पेड़ लगाओ और उसकी देखरेख करो। पेड़ रोपना भी धर्म का एक भाग है।
वेदों में पशुपालन एवं पशु संवर्धन के विषय में भी सुंदर विचार दिया गया है।
हमारी राष्ट्रीय प्रार्थना में भी पशु संवर्धन का स्पष्ट संकेत मिलता है। हौंवें दुधारू गऊएं, पशु अश्व आशुवाही (दोग्ध्री धेनु ……..) प्राचीन काल से ही पशु सम्पदा विश्व में वैभव का प्रतीक मानी जाती थी।
महर्षि दयानंद के कालखंड में विशाल भारत में अफगान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, सिक्किम, नेपाल, श्रीलंका, बह्मदेश (म्यानमार), तिब्बत तक सभी भारत के अविभाज्य अंग थे। उस समय देश की जनसंख्या १८ करोड़ थी और गायों की संख्या ३६ करोड़ थी। हाथी, ऊंट, घोड़े, गधे, बकरी, भेड़, भैंस एवं अन्य जंगली पशुओं को गिना जाता तो यह संख्या एक अरब (सौ करोड़) से ऊपर होगी। आज से ५० वर्ष पूर्व भी गृहस्थ का वैभव कोठी, बड़े भवन, बंगला नहीं थे अपितु पशुओं की संख्या, दुधारू पशु और स्वस्थ पशुओं को देख कर ही सम्बन्ध स्थापित होते थे। पशु संवर्धन से कृषि कर्म के साथ-साथ यातायात, भार वाहन आदि को भी पशुओं की आवश्यकता होती रही है।
अतः पशु संवर्धन का सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। वेदों में गाय को सभी पशुओं में श्रेष्ठ माना गया है। अथर्ववेद में गाय को ब्रह्म का विराट स्वरूप माना गया है। गाय में सभी देवों का निवास है।
एतद्वै विश्वरूपं सर्वरूपम् गोरूपम्।। अथर्व ९.७.२५
महर्षि दयानन्द ने गाय को राष्ट्र की आर्थिक धुरी माना है।
गोकरुणानिधि में गाय के जीवन में ही अनगिनत लाभ गिनाये हैं। इसी कारण उन्होंने राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए गोकृष्यादिरक्षिणी सभा स्थापित की थी जिसमें राष्ट्र विश्व की आर्थिक शक्ति का संवर्धन केन्द्र बन सके।
सुधी पाठकगण जानते हैं कि सन् १८६७ में अजमेर (राजस्थान) प्रवास के समय कर्नल जॉन ब्रुक्स (राजनैतिक दूत लंदन ) के विदाई समारोह में अपने उद्बोधन में महर्षि ने कहा था की कर्नल अपनी महारानी विक्टोरिया को हमारा त्रिसूत्रीय संदेश देना
१. गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करें।
२. गुरुकुल शिक्षा पर कुदृष्टि न डालें।
३. हमारे धर्म ग्रन्थ वेद और इतिहास के साथ छेड़छाड़ न हो।
यदि इस पर विचार नहीं हुआ तो १८५७ की क्रांति को पुनः भी दोहराया जा सकता है। यह था महर्षि का आर्थिक राष्ट्रीय चिन्तन।
वेदों में लगभग १४० से अधिक व्यवसायों ( वृत्तियां) की चर्चा का उल्लेख मिलता है। जैसे…
१. रथकार
२. वस्त्रोद्योग
३. लोहार
४. यांत्रिक
५. स्थयति (मिस्री)
६. हिरण्यकार (सुनार )
७. मणिकार
८. चर्मकार
९. पेशिता (नक्काशी)
१०. सूचीकर्म (दर्जी)
११. मधु निर्माण
१२. वप्ता ( कथिल )नाई
१३. इक्षु उद्योग
१४. मलग (धोबी)
१५. भिषक
१६. नक्षत्रदर्शी ( ज्योतिषी)
१७. प्रश्नविवाक (न्यायाधीश)
१८. वणिक (व्यापारी)
१९. प्राड.विवाक (अधिवक्ता)
२०. कुलपति (शिक्षक/अध्यापक )
२१. शिल्पी आदि।
यजुर्वेद में क्रय विक्रय का आधार वस्तु विनिमय एवं मुद्रा विनिमय बताया गया है। आज अर्थशास्त्र मैं मौद्रिक नीति को पढ़ाया जाता है। तुम क्रय वस्तु मुझे दो, मैं तुम्हें मूल्य प्रदान करता हूं।
देहि में ददामि ते नि मे देहि नि ते दधे। यजु० ३.५०
व्यापार में सफलता के लिए कुछ गुर (विधि/ कर्तव्य ) भी बताए गए हैं। जैसे चरित्र और व्यवहार में शुद्धि हो। उत्थान ,उत्साह, दृढ़ निश्चय और साहस सफलता की कुंजी हैं।
शुनं नो अस्तु चरितमुत्थितं च। अथर्व ० ३.१५.४
वेदों में सूझबूझ और उचित अवसर से सफलता सौ गुणा श्री वृद्धि हो जाती है।
इमां धियं शतसेयाय देवीम्। अथर्व ० ३.१५.३
हम सदैव सत्य का अवलम्बन करते हुए धनोपाजर्न करें।
यह ऋग्वेद का संकेत है।
परि चिन्मर्तो द्रविणं – ऋग० १०.३१.२
यह वसुन्धरा ही धन का मुख्य आधार है।
कृषि ,उद्यान ,पुष्प वाटिका ,वनस्पति, औषधि वन, काष्ठ,अन्न , मसाले,फल, फूल आदि से पुष्कल धन प्राप्त किया जा सकता है। नानाविध, मणि, सोना -चांदी आदि मूल्यवान धातुएं हीरा, पन्ना, पुखराज, संगमरमर, ग्रेनाइट,मृन्तैल पैट्रोल ,डीजल आदि के व्यापार से कंगाल रेगिस्तान भी काला सोना उगलकर विश्व में कुवैत जैसा छोटा देश भी किसी की चौधराहट के आगे नतमस्तक नहीं है।
समुद्र भी संसाधनों से युक्त रत्नाकर समुद्र मंथन का पौराणिक विचार भी कभी आर्थिक व्यापार का ही उदाहरण है। उस समय के चौदह रत्न अमूल्य वैश्विक रत्न थे।
श्री रम्भा विष वारिणी अमिय शंख गजराज।
धनु धनवन्तरि धेनु धन मणि चंद्रमा काज।।
उक्त दोहे में लोग कुछ भी बोलें कहें परंतु यह सब समुद्र मंथन आज भी चल रहा है। प्राकृत गैस डीजल पेट्रोल और असंख्य रत्नों का दोहन आज भी हो रहा है। अमेरिका चीन राक्षस (असुरों ) की सेना के कप्तान है। रूस भारत ब्राजील आदि देश सुरों की सेना के महानायक हैं। पाकिस्तान और रोहिंग्या राहु केतु का पाठ अदा कर खलनायकों के चाटुकार हैं। आर्य समाज में राहु केतु पिण्ड नहीं अपितु चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा के कटान बिन्दु हैं। यही वैदिक सिद्धान्त है।
नदियां कल कल की ध्वनि करती हुई गतिशीलता का निरंतर अपने गंतव्य की ओर बढ़ती हुई वसुन्धरा की उर्वरा को बढ़ाते हुए कहीं विद्युत उत्पादन बड़े-बड़े बांध कलकारखानों को जल वितरण करती हुई धन सम्पदा का भी एक अद्भुत स्त्रोत बनी हुई हैं। इनसे भी हमारी आर्थिक समृद्धि संवर्धित कर रही हैं जैसे गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र भारत का सबसे उपजाऊ क्षेत्र है।
ये नदीनां संस्त्रवन्त्युत्सास: सदमक्षिता अथर्व १.१५.३
विविध उद्योगों से निर्मित वस्तुएं स्थल मार्ग ,जल मार्ग, समुद्री मार्ग आकाशीय मार्ग से जहां-तहां भेज कर धनोपाजर्न किया जा रहा है।
वेदों में कहीं भी दुर्बल, दुर्जन, धनहीन, निर्धन, निर्बल, असहाय, अकिंचन होने का कहीं भी उल्लेख नहीं है। वेदों में अकर्मण्य मनुष्य को राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है। कृषक, उद्यमी और शिल्पी को राष्ट्र का मित्र कहा गया है। अतः आर्थिक ताकत शक्ति को बढ़ाने के लिए वेदों का स्वाध्याय करते रहना चाहिए। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती की पंक्ति सदैव सार्थक सिद्ध है-
मेहनत कर मेहनत कर, कदम मिलाकर चल।
मंजिल स्वागत करेगी तेरा, आज नहीं तो कल।।


