वैदिक चिंतन

वैदिक चिंतन एक विधा है जिसमें वैदिक सिद्धांतों, वैदिक ज्ञान और शाश्वत सत्य पर गहन विचार किया जाता है।

https://www.youtube.com/@VedicChintan25

समाज आँखें खोल, सत्यबोल, सहीमोल, सही तोल, अन्धी श्रद्धा छोड़कर, तू बनजा अनमोल

गाँव की एक कहावत है कि नया नौ दिना, पुराना सब दिना अर्थात ज्यों-ज्यों पुराने हो जाते हैं त्यौं-त्यौं उसकी चमक-दमक बढ़ जाती है। आपने-अपने जीवन में अनुभव किया होगा कि प्रातः काल उगते सूर्य का काषाय (भगवा / अग्नि) रंग और अस्तांचल होते सूर्य के रंग में कोई भेद नहीं होता अपितु एक आशा की किरण संदेशात्मक रूप में छोड़ जाता है कि कल प्रातः यही आभा आपको दिग्दर्शन देगी। सामवेद में जो सामगान किया है उसी को आगे बढ़ाते हुए भारतेन्दु हरिश्चंद से लेकर महाप्राण निराला, महादेवी वर्मा, रामधारीसिंह दिनकर, मैथिली शरण गुप्त, सेनापति, सूर, तुलसी, कबीर, केशवदास, सोहनलाल द्विवेदी जैसे आदिअनेकानेक प्रखर कवियों और मनीषियों ने वेदों का यशोगान किया है, जिन्होंने अपने ज्ञान से आर्य भाषा को समृद्धि प्रदान कर संजोया है, इस शृंखला में महर्षि दयानन्द का वेदोक्त

महा वामदेव्यम् गान, ओ३म् भूर्भुवः स्वः।
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा।
कया शचिष्ठया वृता।


सामवेद ही इन उक्त काव्य पाठों की आधारशिला है। महर्षि दयानंद, आर्य भाषा (हिंदी) में वेदों का भाष्य करके, सभी मनीषियों के प्रणेता बनकर समाज को प्रेरित किया है, इसी क्रम में कुछ देहाती ग्रामीणांचल के धरातल के कविघाघ और गिरधर जैसे बेजोड़ बेधड़क कवि हुए हैं जिन्होंने समाज, संस्कृति, प्रकृति की नस-नाड़ी को भली-भांति समझकर हमें सोचने को विवश किया है। गिरधर कवि नहीं थे पर परिस्थिति वश बन गए, जब वे विवाहोपरांत पांच वर्ष बाद द्विरागमन कर अपनी श्याम सलौनी रुपवती को पैदल-पैदल साथ ला रहे थे तो थकान होने पर जब वह दम्पत्ति वटवृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे तो शीतल मंद बयार (समीप) में उन्हें नींद आ गई। उनके धर्मपत्नी श्याम सलौनी रूपवती ने उनका सर अपनी सुकोमल जङ्घा पर रख लिया अतः और अधिक चिरनिद्रा में सो गए। अचानक जंगल में अकेली देखकर यौवना को दुष्चरित्र लोगों ने अपहरण कर लिया और उसके स्थान पर एक दुष्चरित्रा वृद्धा को वैसे ही बिठा गए। कुछ देर विश्राम कर देखा तो उनके पैरों तले धरती खिसक गई। वहीं से उनके हृदय में काव्य ने कुण्डली के रूप मे स्थान बना लिया। वहीं से उन्होंने ३६० कुण्डलियाँ लिख ड़ाली। जिनमें प्रथम कुण्डली स्त्री पर लिखी।

जैसे कुरान में स्त्री को पैर की जूती और खेती माना जाता है, ठीक उसी तर्ज़ पर व्यंग्य में नारी को पनहीं लिखकर समाज पर करारी चोट की है, जिसमें मुझे कुछ कुण्डली याद रह गयी हैं, उन्हें आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ।

पनहीं

पनहीं पट्टेदार हीं, मेरो भलौ बन्यो हौ सुहाग ।
 उन पनहीं ने कोई ले गयौ, वो हौ शतरंग बाज ॥
   वो हो शतरंज बाज, काज वानै अपने किए।
        माघ मास के दुख, जानै हमकू दिये॥
 कह गिरधर कविराय, रह गई मन कीही मनही।
     नयी लै गयौ चोर, पुरानी छोड़ गयौ पनहीं ॥

फूहड़ स्त्री का लक्षण

चाखी पीसे फूहरी, उठके देर सवेर।
घर मे कुत्ता घुस गयौ, तो खिड़का दियौ फेर ॥
खिड़का दियौ फेर, कुतंगा चार चखारे।
सिगरौ खा गयौ चून, अरे मेरे भइयनके सारे ॥
कह गिरधर कविराय, अरी मेरी फूहड़ काकी ।
आज छोड़ दो मोय, कल कहीं दै चाटूंगौ चाखी ॥

कछु कच्ची कछु कचकची, कंकड़ मैली दार।
फूहड़ बहुत मलूक ही, पर परसत टपकत लार॥
पर परसत टपकत लार, झपट लरका सौचावे।
बिन धोये वो हाथ, दुहत्था चाँद खुजावे॥
कह गिरधर कविराय, फूहड़ के ये ही बैना।
काजर रहयौ है नाय, तये पे सारे नैना॥



चातुर स्त्री के लक्षण

चातुर के लक्खन भले, अंगना डालें दीप।
नहनों कातें कातनों, रात रात लें पीस॥
रात रात लें पीस, भोर भरे अंगन बुहारें।
नित्य नये बनावें सांग, छौंक मस्साले डारें॥
कह गिरधर कविराय, खिलै जैसे चांद उजारी।
सुन्दर ओढ़े ओढ़ना,लगें वो सबकू प्यारी॥

समाजिक दोष (हुक्का)

हुक्का ते हुरमत गयी, लिहाज शर्म गयी छूट।
तू सबकौ झूठौ खाते है, तेरी गयी हिये की फूट॥
तेरी गयी हिये की फूट,आग कू घर घर डोलें।
जापै मांगें आग,नार अखराती बोले॥
कह गिरधर कविराय,अरे मन सुक्का।
घर मानस मर जाय, जबहु ना छूटे हुक्का॥



बड़ों का बड़प्पन
कागा और हंस
कागा खाइके जौंडरी, वोले वचन भवंग ।
हंसन की सरहर करें, उड़न चहत हैं संग ॥
उड़न चहत हैं संग, समुंदर बीच कागा हारयौ ।
दै पंजे की बीच, पार पै कागा डारयौ ॥
कह गिरधर कविराय, बड़ेन के जेहि बड़ौआ ।
दै पंजेन के बीच, पार पै डारयौ कोआ ॥


जौंड़री ( ज्वार)
दान
पानी बाढ़यो नाव में, घर में बाढ़े दाम ।  
दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ॥  
यही सयानो काम, नाम इक हर कौ लीजे ।
परमारथ के काज, शीश अपनों धरदीजै ॥
कह गिरधर कविराय, बड़ेन की ये ही बानी।
चलिए चाल सुचाल, राखियौ अपनौ पानी (स्वाभिमान) ॥

   

विचार हीन की दुर्दशा

बिना विचारे जो करै, सो पाछै पछिताय ।
काम बिगारै आपनौ, जग में होत हंसाय ॥
जग में होत हंसाय, चित्त कू चैन न पावै ।
खान पान सम्मान, राग रंग कछु मनहिं न भावै ॥
कह गिरधर कविराय, दुख कछु टरत न टारै ।
खटकत हैं मन माहि कियौ जो बिना विचारै ॥

संसार में स्वार्थ (दुनियाँ मतलब की)


सांई या संसार में, मतलब कौ ब्यौहार ।
जब लग पैसा पास है, तब लग ताकौ यार ॥
तब लग ताकौ यार, यार संग ही संग डोलै ।
अब पैसा रह्यौ न पास, यार मुख ते नहीं बोलै ॥
कह गिरधर कविराय, जगत का यही लेखा भाई ।
करै बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई सांई ॥


गुणवान की महिमा


गुन के ग्राहक सहसनर, बिन गुन लहै न कोय ।
जैसे कागा, कोकिला, शब्द सुने सब कोय ॥
शब्द सुने सब कोय, कोकिला सबै सुहावन ।
दोऊ कौ एक रंग, काग सब भये अपावन ॥
कह गिरधर कविराय, सुनौ हों ठाकुर मनके ।
बिन गुन लहै न कोय, सहसनर ग्राहक गुनके ॥

दौलत का अभिमान


दौलत पाये ने कीजिए, सपनेहु में अभिमान ।
चंचला दिन चारि कौ, ठाऊँ न रहित निदान ॥
ठाऊँ न रहित निदान, जिअत जग में जस लीजे ।
मीठे वचन सुनाय, विनय सबकी ही कीजे ॥
कह गिरधर कविराय, अरे यह सब घट दौलत ।
पैसा निशदिन चारि, रहत सबके ही दौलत ॥

   
अतः प्रत्येक मनुष्य को प्राचीन कवि, लेखक, मनीषी, विद्वज्जन, विदुषियों, शिक्षकों उपदेशकों के सद्साहित्य और विचारों को आत्मसात करना चाहिए, साथ ही वीर, वीरांगनाओं, राष्ट्रभक्तों के चित्र एवं चरित्र को समझने के लिए भी हम साहित्य के अनुगामी बनें। आज बड़े-बड़े सनातनी भी इस संस्कृत, संस्कृति, संस्कार से अपरिचित हैं। कोई भी व्यक्ति तिलक, कंठी, रुद्राक्ष, जनेऊ, रक्षा सूत्र, काषाय वस्त्र, पीले वस्त्र, गले में केसरिया अंगवस्त्र, सर पर भगवा पग (पगड़ी) अथवा कुर्ता धोती पहिनने से ही धर्मभक्त, ईश्वरभक्त, राष्ट्रभक्त, वेदभक्त नहीं हो सकता, न सनातनी हो सकता।  उसने कितना प्रमाणिक सदसाहित्य को पढ़कर अपने आचरण से प्रभावित और प्रकाशित किया है इसलिए वेद की सूक्ति है

आचरणहीनं न पुनन्तु वेदाः।

अर्थात आचरणहीन का तो वेद भी उद्धार नहीं कर सकते,

आज राष्ट्र में धर्म के नाम पर चपत लगाने वाले चंपत राय की तरह गली मोहल्ला ग्राम-ग्राम , नगर, राजधानी में कतिपय को छोड़कर साधु, सन्यासी, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, महंत, मठाधीश, आचार्य, शङ्कराचार्यः, जगद्गुरु यही तो कर रहे हैं, 5000 वर्ष पहले महाभारत के राज सदन में भीष्म पितामह (आदित्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी) आचार्य द्रोण, कुलगुरु कृपाचार्य, राष्ट्रमंत्री विदुर, शासक धृतराष्ट्र सब मौन हो गए। आज एक द्रौपदी नहीं, अपितु रामभक्त (बहुरूपिये / छद्मवेशी) रूप धारण करने वालों ने रावण की भाँति काषाय चोला पहनकर रामचंद्र महाराज (रामलला) के परिवार की नगदी (सोना चांदी हीरा मणि आदि) को चपत कर गटक गए। आज सत्ता में बैठे सभी मंत्रियों ने गांधारी की तरह आँख पर पट्टी बाँध रखी है और राष्ट्र का धृतराष्ट्र अपने मानस पुत्र को दुर्योधन की तरह इंद्रप्रस्थ पर देखना चाहता है। योगी का कद महामंत्री विदुर की तरह बौना कर दिया है, अब देखना है कि राष्ट्रभोगी और रोगियों के हाथ में सुरक्षित है अथवा किसी योगी की ओर देख रहा है, इसी संदर्भ में राष्ट्रीय कवि सूर्यकांत त्रिपाठी के प्रपौत्र की स्वरचित रचना हमें यथार्थ पर प्रकाश डालती हुई दृष्टिगोचर दिखती है।


उधौ राम चढ़ावा चोरी

   रामशिला सोना चांदी सब, नगदी संग बटोरी ॥
       हिंदू संकट सबले चंपत, ट्रस्टी भरे तिजौरी ।
    राम नाम की लूट मची, कर्नाटक पहुंची बोरी ॥
   मर्यादा पुरुषोत्तम कहते, हरकत वही छिछोरी ।

  रंग मंच पर नायक आया, सर पर बांधकर मौरी ॥
    भक्ति खड़े एक टक देखें, जैसे चांद चकोरी ।
    बढ़ी आस्था श्रद्धा गाते, श्रद्धा राम फिल्लौरी ॥
     काशी, मथुरा मंदिर टूटे, जनता करें चिरौरी ।
     साथ महाठग मिले , अयोध्या लाए जोग ठगौरी ॥


आज राम की मर्यादा का पालन करने और कराने वाले ही चंपत राय की चंपत के साथ खड़े हैं, मुंह में राम बगल में छुरिया, श्वास श्वास में ल है, वाली कविता चरितार्थ हो रही है।

आज श्री कृष्ण की गीता और महर्षि दयानंद का कालजयी ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ने के साथ समझने की आवश्यकता है। महर्षि दयानंद ने 14 समुल्लास (अध्याय) में चौदह रत्न परोस कर हमें जो कुछ दिया है, राजा कैसा हो मंत्री, सेनापति, वैज्ञानिक, शिक्षक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि कैसे हो, तभी हम चक्रवर्ती सम्राट और विश्व गुरु बन सकते हैं, विद्या प्राप्त करने का सभी को अधिकार है। कोई भी मनुष्य विद्या से वंचित न रहे, सभी अपने-अपने चरित्र का निर्माण करें। फिर राष्ट्र में कोई चोर, बदमाश, नशेड़ी, कंजूस, धूर्त, पाखण्डी, बलात्कारी नहीं होगा महाराज अश्वपति अपने राज्य में एक घोषणा (अध्यादेश) करते हैं – हे! ऋषिगण


न मे स्तेनो जनपदे, न कर्दयो न मद्यपः।
नानाहिर्ताग्नि न अविद्वान न स्ववैरी च स्ववैरिणी कुतः।।


अर्थात मेरे राज्य में कोई भी चोर, कञ्जूस, नशा  (मद्य) करने वाला राज्य में कोई अविद्वान भी नहीं है, साथ कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो प्रतिदिन अर्थात नित्य हवन ना करता हो और कोई भी पुरुष व्यभिचारी नहीं है फिर कोई भी देवी (स्त्री) कैसे व्यभिचारणी हो सकती है। यह चरित्र था मेरे राष्ट्र का। आज तो राम राज्य वाले भी अपनी और अपने परिवार की गारंटी तो छोड़ो वारंटी नहीं ले सकते। गांव का मुखिया सरपंच भी नहीं ले सकता। आज सरकार और समाज को यहां तक की भूमंडल को अपना (आईकॉन) परमचक्षु महर्षि दयानंद को बनाकर वैदिक सिद्धांत को आत्मसात करना चाहिए तभी अंधभक्ति से बचा जा सकता है नहीं तो कितने ही चंपत, संपतभोली जनता को चपत लगाते रहेंगे।


  कनक भवन में ऊंघ रहे थे, भरत नेशनल थ्योरी ।
   मंथर गति से चली मंथरा, लेकर फिर स्टोरी ॥
      बैठे आगे दर्शक जागे, भागे हाथ कटोरी ।
   खत्म नाटिका खींच रहे हम, अब पर्दे की डोरी ॥
निराला प्रपौत्र


अंधकार है वहाँ,
जहाँ आदित्य नहीं है।
मुर्दा है वह देश,    
जहां साहित्य नहीं है।
                          –
रामधारी सिंह दिनकर

आठ प्रहर में आठ ही ड्रेसें, जिहि जोवन की जोरी ।
सादा जीवन उच्च विचार की, अब है रही छिछोरी ॥

मनुज बनो शुभ कर्म कमाओ, सदा ख़ुमारी न रहैनी।

चले गए जिन कितने आए, ये संसारी न रहैनी।

शुभेच्छु

गजेंद्र सिंह आर्य

राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता, पूर्व प्राचार्य, पथ प्रदर्शक
धर्माचार्य (जेपी विश्वविद्यालय, अनूपशहर
)
संरक्षक (महर्षि दयानंद स्मारक कर्णवास, अनूपशहर)
जलालपुर (अनूपशहर)
बुलंदशहर – २०३३९०

उत्तर प्रदेश

चल दूरभाष – ९७८३८९७५११

Date: 02 July 2026